<rss version="2.0">
    <channel>
        <title>
            <![CDATA[ शैलेश भारतवासी - निर्देशक, हिंद युग्म ]]>
        </title>
        <link>
            <![CDATA[ https://www.frontlist.in/public/shailesh-indian-director-hind-couple ]]>
        </link>
        <description>
            <![CDATA[ <p>हिंद युग्म के संस्थापक-संपादक शैलेश भारतवासी एक इंजीनियरिंग स्नातक हैं, लेकिन साहित्य के प्रति उनका प्यार और स्नेह बचपन से ही एक सतत यात्रा रही है। उन्होंने इंटरनेट की सॉफ्टवेयर दुनिया में हिंदी अनुप्रयोगों की एक विस्तृत श्रृंखला को लोकप्रिय बनाने की दिशा में अपने उद्यमशीलता के जुनून को प्रसारित किया।</p><p>वे हिंदी प्रकाशन में एक नई लहर का नेतृत्व करने में बेहद सफल रहे हैं। होनहार कहानीकारों को खोजने के अलावा, वह अपरंपरागत शैलियों में कविता, कथा और गैर-कथाओं के एक तांत्रिक मिश्रण की पेशकश करने में नए आधार तोड़ रहे हैं। ऐसे समय में जब दुनिया भर में कविता प्रकाशन की दुनिया सिकुड़ रही है, शैलेश के हिंद युग्म ने नए उभरते कवियों को स्थान दिया है। हिन्द युग्म ने नई पीढ़ी के युवा लेखकों को जन्म दिया है और भारत के प्रकाशन इतिहास में एक शक्तिशाली ट्रेंडसेटर बन गया है।</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः</strong> ‘नई वाली हिंद’ आंदोलन ने युवाओं में और अधिक हिंदी पुस्तकें पढ़ने की गति को किस प्रकार उभारा है?</p><p><strong>शैलेषः</strong> नई वाली हिंदी एक ऐसा आंदोलन है जिसने हिंदी किताबों से विमुख हो गए पाठकों को एक बार फिर से हिंदी किताबों की तरफ़ मोड़ा है। यह दौर भदेस के सेलिब्रेशन का है। इंटरनेट ने हर तरह की स्थानीय आवाज़ों को वैश्विक मंच दिया है, तो नई वाली हिंदी ने समय के इस बदलाव को पहचाना और लिखने तथा पढ़ने वालों, दोनों को सीधे तौर पर उनकी भाषा में संवाद करने अवसर दिया। इससे हिंदी में बहुत सारे ऐसे लेखक आए जिनकी प्रतिध्वनि को विशेष तौर पर युवा पाठकों ने पहचाना और ख़ुद को उससे जुड़ा हुआ महसूस किया। इसी का परिणाम है कि आज के समय में लाखों युवा हिंदी किताबों की तरफ़ देख रहे हैं।</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः </strong>हिंद युग्म किस प्रकार हिन्दी लेखकों को उनकी कृतियों की पहचान और पहचान दिलाने में सहायता कर रहा है?</p><p><strong>शैलेषः</strong> एक तो हिंद युग्म का दायरा वैश्विक है तो हमारे लेखकों की पहचान वैश्विक है। हिंद युग्म मुद्रित दुनिया के साथ-साथ हर किताब के ईबुक, ऑडियोबुक संस्करण भी प्रकाशित कर रहा है, जिससे नए समय के पाठक भी उस किताब को पढ़ रहे हैं। हिंद युग्म अपनी ज़्यादातर किताबों को फ़िल्म तथा वेबसीरीज़ निर्माण के लिए निर्माता-निर्देशकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है। कुछ किताबों पर बनी फ़िल्में तथा वेबसीरीज़ प्रदर्शित भी हो चुकी हैं, और बहुत-सी पुस्तकों पर काम चल रहा है।</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः</strong> अँग्रेज़ी किताबों की तुलना में हिंदी पाठकों की कमी अभी भी है। माता-पिता अपने बच्चों को अँग्रेजी पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। यह हिंदी प्रकाशन के विस्तार में किस प्रकार बाधा उत्पन्न कर रहा है?</p><p><strong>शैलेषः</strong> यह हर तरीक़े से बाधा ही है। मेरा मानना है कि हमारे देश में पढ़ने की कोई समृद्ध परंपरा कभी नहीं रही और विशेष तौर पर हिंदी भाषी क्षेत्रों में तो लगभग न के बराबर ही रही। हम सब ऐसे लोग हैं जो अँग्रेज़ी भाषा और अँग्रेज़ीयत को कुलीनता और समृद्धि से जोड़कर देखते हैं।</p><p>मेरा मानना है कि किसी भी भाषा का साहित्य (चाहे वो फ़िक्शन हो या नॉन फ़िक्शन, या इससे इतर कुछ) ऐसे लोग ही पढ़ते हैं कि जिनकी शुरुआती शिक्षा उसी भाषा में हुई हो। यानी हिंदी भाषा के साहित्य से उस व्यक्ति का जुड़ाव सर्वाधिक होगा जिसकी शुरुआती शिक्षा-दीक्षा हिंदी माध्यम में हुई हो। इसलिए हिंदी किताबों के पाठक पर्याप्त संख्या में नहीं हैं।</p><p>हिंदी को माध्यम के तौर पर न चुनने में माता-पिता का कोई दोष नहीं है, दोष हमारे देश की भाषानीति का है। यदि हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले किसी व्यक्ति को उच्च शिक्षा तथा रोज़गार के वैश्विक स्तर पर समान अवसर मिलें तो हर माँ-बाप अपने बच्चों को अपनी भाषा में पढ़ाना पसंद करेंगे। यदि हम भारतीय भाषाओं से जुड़े किसी भी कस्मि के उत्थान की बात करना चाहते हैं तो पहले हमें अपने देश की भाषानीति पर काम करना होगा।</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः</strong> &nbsp;हमारे पास कई हिंदी प्रकाशन कंपनियां हैं, लेकिन हिंद युग्म दूसरों से कैसे अलग है?</p><p><strong>शैलेषः</strong> हिंद युग्म कई स्तरों पर ज्यादातर हिंदी प्रकाशनों से अलग है। सबसे पहला अंतर तो यही है कि हिंद युग्म पांडुलिपियों या लेखकों का चुनाव पारंपरिक तरीक़े से नहीं करता। ज़्यादातर हिंदी प्रकाशन हिंदी की लघुपत्रिकाओं में छपी रचनाओं या संबंधित लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित करते रहे हैं। मेरे कहने का मतलब है कि यदि कोई लेखक अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहता था तो पहले उन्हें लघुपत्रिकाओं के संपादकों की नजर में आना होता था। लेकिन हिंद युग्म लेखकों के लिखे का सीधे तौर पर मूल्यांकन करता है और उन्हें प्रकाशित करता है।</p><p>दूसरा भारी अंतर कलेवर का है। हिंद युग्म अपनी पुस्तकों वैश्विक कलेवर में प्रकाशित करता है। परिणामस्वरूप किताब से ताज़ापन झलकता है और युवा तथा समकालीन पाठक उससे आकर्षित होते हैं।</p><p>तीसरा अंतर नई वाली हिंदी का है, जो हिंदी भाषा की तमाम क्षेत्रीय जबानों और आवाज़ों को मुख्यधारा से सीधे जोड़ता है</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः</strong> एनईपी 2022 ने शिक्षा प्रणाली को बदल दिया है और क्षेत्रीय भाषाओं को महत्व दिया है। क्या आप मानते हैं कि प्रकाशन उद्योग इस नई चुनौती से निपटने के लिए तैयार है?</p><p><strong>शैलेषः</strong> राष्ट्रीय शैक्षिक नीति 2022 की यह पहल स्वागत योग्य है, लेकिन मुझे लगता है कि प्रकाशन उद्योग अभी इस चुनौती को पूरी तरीक़े से स्वीकारने को तैयार नहीं है। विशेष रूप से यदि मैं हिंदी की बात करूँ तो हिंदी में अभी उस तरह के लेखन का सर्वथा अभाव है जो बच्चों के लिए ज्ञान-विज्ञान, तकनीक आदि विषयों पर किए जा रहे हों। हिंदी का ज्यादातर लेखन साहित्य-विषयक है। हाँ, यह बात जरूर है कि नई शिक्षा नीति हिंदी प्रकाशन उद्योग के लिए एक सकारात्मक माहौल जरूर तैयार करेगी और यदि सरकार अपनी नई नीति पर लंबे समय तक टिकी रही तो प्रकाशन उद्योग इस तरह के लेखक तथा पुस्तकें तैयार कर लेगा।</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः</strong> &nbsp;सोशल मीडिया सभी प्रकाशकों के लिए खुद को सामाजिक जानकार के रूप में स्थापित करने के लिए एक नई चुनौती लेकर आया है। हिंद युग्म ने इसे एक अवसर के रूप में कैसे देखा है?</p><p><strong>शैलेषः</strong> हिंद का जन्म ही इंटरनेट, ईकॉमर्स तथा सोशल मीडिया की वजह से हुआ है। एक पाठक से लाखों पाठकों की हमारी यात्रा सोशल मीडिया की उड़ान से ही संभव हो पाई है। हिंद युग्म सोशल मीडिया पर बहुत अधिक सक्रिय है और अपने पाठकों से निरंतर सीधा संवाद कर रहा है।</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः</strong> नीलसन बुकस्कैन डेटा के अनुसार, हिंदी-अनुवादित पुस्तकों की तुलना में मूल हिंदी किताबों की बिक्री बहुत कम है। हम इस अंतर को कैसे पाट सकते हैं? कृपया अपने विचार साझा करें।</p><p><strong>शैलेषः</strong> देखिए, पाठकों की अभिरुचि बदल रही है। पिछले दो दशकों में दुनिया भर में पढ़ने वाले फ़िक्शन से अधिक अब नॉन फ़िक्शन पढ़ रहे हैं। फ़िक्शन की ख़ुराक उन्हें फ़िल्म तथा वेबसीरीज़ के माध्यम से मिल रही है, नॉन फ़िक्शन की ख़ुराक भी मिल रही है, लेकिन कम मिल रही है। अभी भी उसके लिए उन्हें पुस्तकों की तरफ़ देखना होता है। हिंदी में अभी उस तरह की सामग्री की बहुत कमी है। इसलिए हिंदी के पाठक अपनी इस तरह की भूख अनुवादित पुस्तकों से मिटाते हैं। हिंदी का पाठक भी इंटरनेट के एक्सपोज़र की वजह से बहुत अधिक विकसित हो चुका है, इसलिए हमें यदि उसे अपने से जोड़े रखना है तो उसे ऐसी किताबें देनी होंगी जो उसे इंटरनेट मीडिया से अलग और बेहतर अनुभव दे सके, नहीं तो हम यह लड़ाई हार जाएँगे।</p> ]]>
        </description>
        <language>en</language>
        <pubDate>Wed, 09 07, 2022 12:52 pm</pubDate>
        <item>
            <title>
                <![CDATA[ शैलेश भारतवासी - निर्देशक, हिंद युग्म ]]>
            </title>
            <link><![CDATA[ https://www.frontlist.in/public/shailesh-indian-director-hind-couple ]]></link>
            <description>
                <![CDATA[ <p>हिंद युग्म के संस्थापक-संपादक शैलेश भारतवासी एक इंजीनियरिंग स्नातक हैं, लेकिन साहित्य के प्रति उनका प्यार और स्नेह बचपन से ही एक सतत यात्रा रही है। उन्होंने इंटरनेट की सॉफ्टवेयर दुनिया में हिंदी अनुप्रयोगों की एक विस्तृत श्रृंखला को लोकप्रिय बनाने की दिशा में अपने उद्यमशीलता के जुनून को प्रसारित किया।</p><p>वे हिंदी प्रकाशन में एक नई लहर का नेतृत्व करने में बेहद सफल रहे हैं। होनहार कहानीकारों को खोजने के अलावा, वह अपरंपरागत शैलियों में कविता, कथा और गैर-कथाओं के एक तांत्रिक मिश्रण की पेशकश करने में नए आधार तोड़ रहे हैं। ऐसे समय में जब दुनिया भर में कविता प्रकाशन की दुनिया सिकुड़ रही है, शैलेश के हिंद युग्म ने नए उभरते कवियों को स्थान दिया है। हिन्द युग्म ने नई पीढ़ी के युवा लेखकों को जन्म दिया है और भारत के प्रकाशन इतिहास में एक शक्तिशाली ट्रेंडसेटर बन गया है।</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः</strong> ‘नई वाली हिंद’ आंदोलन ने युवाओं में और अधिक हिंदी पुस्तकें पढ़ने की गति को किस प्रकार उभारा है?</p><p><strong>शैलेषः</strong> नई वाली हिंदी एक ऐसा आंदोलन है जिसने हिंदी किताबों से विमुख हो गए पाठकों को एक बार फिर से हिंदी किताबों की तरफ़ मोड़ा है। यह दौर भदेस के सेलिब्रेशन का है। इंटरनेट ने हर तरह की स्थानीय आवाज़ों को वैश्विक मंच दिया है, तो नई वाली हिंदी ने समय के इस बदलाव को पहचाना और लिखने तथा पढ़ने वालों, दोनों को सीधे तौर पर उनकी भाषा में संवाद करने अवसर दिया। इससे हिंदी में बहुत सारे ऐसे लेखक आए जिनकी प्रतिध्वनि को विशेष तौर पर युवा पाठकों ने पहचाना और ख़ुद को उससे जुड़ा हुआ महसूस किया। इसी का परिणाम है कि आज के समय में लाखों युवा हिंदी किताबों की तरफ़ देख रहे हैं।</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः </strong>हिंद युग्म किस प्रकार हिन्दी लेखकों को उनकी कृतियों की पहचान और पहचान दिलाने में सहायता कर रहा है?</p><p><strong>शैलेषः</strong> एक तो हिंद युग्म का दायरा वैश्विक है तो हमारे लेखकों की पहचान वैश्विक है। हिंद युग्म मुद्रित दुनिया के साथ-साथ हर किताब के ईबुक, ऑडियोबुक संस्करण भी प्रकाशित कर रहा है, जिससे नए समय के पाठक भी उस किताब को पढ़ रहे हैं। हिंद युग्म अपनी ज़्यादातर किताबों को फ़िल्म तथा वेबसीरीज़ निर्माण के लिए निर्माता-निर्देशकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है। कुछ किताबों पर बनी फ़िल्में तथा वेबसीरीज़ प्रदर्शित भी हो चुकी हैं, और बहुत-सी पुस्तकों पर काम चल रहा है।</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः</strong> अँग्रेज़ी किताबों की तुलना में हिंदी पाठकों की कमी अभी भी है। माता-पिता अपने बच्चों को अँग्रेजी पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। यह हिंदी प्रकाशन के विस्तार में किस प्रकार बाधा उत्पन्न कर रहा है?</p><p><strong>शैलेषः</strong> यह हर तरीक़े से बाधा ही है। मेरा मानना है कि हमारे देश में पढ़ने की कोई समृद्ध परंपरा कभी नहीं रही और विशेष तौर पर हिंदी भाषी क्षेत्रों में तो लगभग न के बराबर ही रही। हम सब ऐसे लोग हैं जो अँग्रेज़ी भाषा और अँग्रेज़ीयत को कुलीनता और समृद्धि से जोड़कर देखते हैं।</p><p>मेरा मानना है कि किसी भी भाषा का साहित्य (चाहे वो फ़िक्शन हो या नॉन फ़िक्शन, या इससे इतर कुछ) ऐसे लोग ही पढ़ते हैं कि जिनकी शुरुआती शिक्षा उसी भाषा में हुई हो। यानी हिंदी भाषा के साहित्य से उस व्यक्ति का जुड़ाव सर्वाधिक होगा जिसकी शुरुआती शिक्षा-दीक्षा हिंदी माध्यम में हुई हो। इसलिए हिंदी किताबों के पाठक पर्याप्त संख्या में नहीं हैं।</p><p>हिंदी को माध्यम के तौर पर न चुनने में माता-पिता का कोई दोष नहीं है, दोष हमारे देश की भाषानीति का है। यदि हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले किसी व्यक्ति को उच्च शिक्षा तथा रोज़गार के वैश्विक स्तर पर समान अवसर मिलें तो हर माँ-बाप अपने बच्चों को अपनी भाषा में पढ़ाना पसंद करेंगे। यदि हम भारतीय भाषाओं से जुड़े किसी भी कस्मि के उत्थान की बात करना चाहते हैं तो पहले हमें अपने देश की भाषानीति पर काम करना होगा।</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः</strong> &nbsp;हमारे पास कई हिंदी प्रकाशन कंपनियां हैं, लेकिन हिंद युग्म दूसरों से कैसे अलग है?</p><p><strong>शैलेषः</strong> हिंद युग्म कई स्तरों पर ज्यादातर हिंदी प्रकाशनों से अलग है। सबसे पहला अंतर तो यही है कि हिंद युग्म पांडुलिपियों या लेखकों का चुनाव पारंपरिक तरीक़े से नहीं करता। ज़्यादातर हिंदी प्रकाशन हिंदी की लघुपत्रिकाओं में छपी रचनाओं या संबंधित लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित करते रहे हैं। मेरे कहने का मतलब है कि यदि कोई लेखक अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहता था तो पहले उन्हें लघुपत्रिकाओं के संपादकों की नजर में आना होता था। लेकिन हिंद युग्म लेखकों के लिखे का सीधे तौर पर मूल्यांकन करता है और उन्हें प्रकाशित करता है।</p><p>दूसरा भारी अंतर कलेवर का है। हिंद युग्म अपनी पुस्तकों वैश्विक कलेवर में प्रकाशित करता है। परिणामस्वरूप किताब से ताज़ापन झलकता है और युवा तथा समकालीन पाठक उससे आकर्षित होते हैं।</p><p>तीसरा अंतर नई वाली हिंदी का है, जो हिंदी भाषा की तमाम क्षेत्रीय जबानों और आवाज़ों को मुख्यधारा से सीधे जोड़ता है</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः</strong> एनईपी 2022 ने शिक्षा प्रणाली को बदल दिया है और क्षेत्रीय भाषाओं को महत्व दिया है। क्या आप मानते हैं कि प्रकाशन उद्योग इस नई चुनौती से निपटने के लिए तैयार है?</p><p><strong>शैलेषः</strong> राष्ट्रीय शैक्षिक नीति 2022 की यह पहल स्वागत योग्य है, लेकिन मुझे लगता है कि प्रकाशन उद्योग अभी इस चुनौती को पूरी तरीक़े से स्वीकारने को तैयार नहीं है। विशेष रूप से यदि मैं हिंदी की बात करूँ तो हिंदी में अभी उस तरह के लेखन का सर्वथा अभाव है जो बच्चों के लिए ज्ञान-विज्ञान, तकनीक आदि विषयों पर किए जा रहे हों। हिंदी का ज्यादातर लेखन साहित्य-विषयक है। हाँ, यह बात जरूर है कि नई शिक्षा नीति हिंदी प्रकाशन उद्योग के लिए एक सकारात्मक माहौल जरूर तैयार करेगी और यदि सरकार अपनी नई नीति पर लंबे समय तक टिकी रही तो प्रकाशन उद्योग इस तरह के लेखक तथा पुस्तकें तैयार कर लेगा।</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः</strong> &nbsp;सोशल मीडिया सभी प्रकाशकों के लिए खुद को सामाजिक जानकार के रूप में स्थापित करने के लिए एक नई चुनौती लेकर आया है। हिंद युग्म ने इसे एक अवसर के रूप में कैसे देखा है?</p><p><strong>शैलेषः</strong> हिंद का जन्म ही इंटरनेट, ईकॉमर्स तथा सोशल मीडिया की वजह से हुआ है। एक पाठक से लाखों पाठकों की हमारी यात्रा सोशल मीडिया की उड़ान से ही संभव हो पाई है। हिंद युग्म सोशल मीडिया पर बहुत अधिक सक्रिय है और अपने पाठकों से निरंतर सीधा संवाद कर रहा है।</p><p><strong>फ्रंटलिस्टः</strong> नीलसन बुकस्कैन डेटा के अनुसार, हिंदी-अनुवादित पुस्तकों की तुलना में मूल हिंदी किताबों की बिक्री बहुत कम है। हम इस अंतर को कैसे पाट सकते हैं? कृपया अपने विचार साझा करें।</p><p><strong>शैलेषः</strong> देखिए, पाठकों की अभिरुचि बदल रही है। पिछले दो दशकों में दुनिया भर में पढ़ने वाले फ़िक्शन से अधिक अब नॉन फ़िक्शन पढ़ रहे हैं। फ़िक्शन की ख़ुराक उन्हें फ़िल्म तथा वेबसीरीज़ के माध्यम से मिल रही है, नॉन फ़िक्शन की ख़ुराक भी मिल रही है, लेकिन कम मिल रही है। अभी भी उसके लिए उन्हें पुस्तकों की तरफ़ देखना होता है। हिंदी में अभी उस तरह की सामग्री की बहुत कमी है। इसलिए हिंदी के पाठक अपनी इस तरह की भूख अनुवादित पुस्तकों से मिटाते हैं। हिंदी का पाठक भी इंटरनेट के एक्सपोज़र की वजह से बहुत अधिक विकसित हो चुका है, इसलिए हमें यदि उसे अपने से जोड़े रखना है तो उसे ऐसी किताबें देनी होंगी जो उसे इंटरनेट मीडिया से अलग और बेहतर अनुभव दे सके, नहीं तो हम यह लड़ाई हार जाएँगे।</p> ]]>
            </description>
            <category>Interviews</category>
            <author>
                <![CDATA[ Frontlist ]]>
            </author>
            <guid>2</guid>
            <pubDate>Wed, 09 07, 2022 12:52 pm</pubDate>
        </item>
    </channel>
</rss>
