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            <![CDATA[ मैनेजर पांडेय ने साहित्य के माध्यम से क्रांति का स्वप्न देखा – गोपेश्वर सिंह ]]>
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            <![CDATA[ https://www.frontlist.in/public/manajara-padaya-na-sahataya-ka-mathhayama-sa-karata-ka-savapana-thakha-gapashavara-saha ]]>
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        <description>
            <![CDATA[ <p>नयी दिल्ली – हिंदी के वरिष्ठ आलोचक गोपेश्वर सिंह ने कहा कि साहित्य के माध्यम से क्रांति का स्वप्न देखा जा सकता है । यह मैनेजर पांडेय की पहली पुस्तक शब्द और कर्म में लिखा है। पांडेय ने साहित्य के माध्यम से क्रांति का स्वप्न देखा और देखना सिखाया। उन्होंने कहा कि पांडेय ने साहित्य में समाजिकता को रेखांकित करने का काम किया। दलित साहित्य पर कोई आलोचक बात नहीं करता पांडेय ने इस पर बात की । वे मार्क्सवादी विचारधारा का विकल्प क्या हो इसकी खोज करते रहे। गोपेश्वर सिंह ने यह बात बीती शाम साहित्य अकादेमी सभागार में आयोजित हिंदी आलोचना में मैनेजर पांडेय का योगदान संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में विचार व्यक्त करते हुए कही । संगोष्ठी का आयोजन वाणी प्रकाशन ग्रुप द्वारा मैनेजर पांडेय की पहली पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर किया।&nbsp;</p><p>संगोष्ठी की शुरुआत में वाणी प्रकाशन ग्रुप से प्रकाशित प्रो. सरवरुल हुदा की संपादित पुस्तक हमने जाती हुई दुनिया को पुकारा ही नहीं (मैनेजर पांडेय को याद करते हुए) का लोकार्पण किया गया । इससे पहले सभागार में उपस्थित सभी अतिथि वक्ताओं का स्वागत वाणी प्रकाशन ग्रुप की प्रंबध निदेशक अदिति माहेश्वरी द्वारा पौधे भेंट कर किया गया।&nbsp;</p><figure class="image"><img src="https://www.frontlist.in/storage/ckeditor/1699340775_मैनेजर_पांडेय_ने_साहित्य_के_माध्यम_से_क्रांति_का_स्वप्न_देखा_–_गोपेश्वर_सिंह__Frontlist_(1).jpg"></figure><p>लोकार्पित के पश्चात बोलते हुए संपादक सरवरुल हुदा ने कहा कि यह किताब चंद दिनों का नतीजा नहीं है । हिंदी में आलोचना की भाषा पर विचार-विमर्श नहीं हुआ। हम जो छपता है उसे आलोचना मान लेते हैं। एक आलोचक के रूप में पांडेय जी से क्या मिला है इस पर चर्चा होनी चाहिए। हुदा ने कहा कि मुझे पांडेय से बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। पांडेय की याद हर दिन आती है ।&nbsp;</p><p>मैनेजर पांडेय के छात्र रहे कवि आलोचक जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि पांडेय जी कहते थे कि आलोचक के पास ठोस तर्क होना चाहिए सहमति के लिए भी, असहमति के लिए भी। वे ढर्रेवादी आलोचक नहीं थे। उन्होंने हिंदी जगत &nbsp;को बताया कि विभाजन पर अज्ञेय की 8 कविताएं हैं। जब अन्य आलोचक कहानी, उपन्यास, कविता पर लिख रहे थे तब पांडेय ने हिंदी आलोचना की ताकत और विवेक पर लिखा। उन्होंने इतिहास, वर्तमान और भविष्य को देखने की दृष्टि विकसित की। जनभाषा में काम किया। पांडेय की आलोचना रेंज बहुत बड़ी थी ।&nbsp;</p><figure class="image"><img src="https://www.frontlist.in/storage/ckeditor/1699340797_मैनेजर_पांडेय_ने_साहित्य_के_माध्यम_से_क्रांति_का_स्वप्न_देखा_–_गोपेश्वर_सिंह__Frontlist_(2).jpg"></figure><p>कवि कथाकार कमलेश भट्ट कमल ने अपना एक संस्मरण साझा करते हुए कहा कि एक रात बरेली में मैनेजर पांडेय जी &nbsp;के आतिथ्य का मौका मिला क्योंकि अगले दिन पांडेय जी को सुधीर विद्यार्थी की किताब का लोकार्पण करना था। पांडेय ने मुझे विस्तार से लेखन में सफलता और सार्थकता का अंतर समझाया और यहीं से मेरे सोचने का नजरिया ही बदल गया। भट्ट ने पांडेय के बारे में एक और बात कही कि उनकी बातचीत की भी एक अलग देहभाषा थी। कोलकाता से आए पांडेय के छात्र ज्योतिमय बाग ने एक शिक्षक के रूप में पांडेय का स्मरण किया।&nbsp;</p><p>कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे लेखक और शिक्षाविद् सदीकुर रहमान किदवई ने कहा कि आज मुझे &nbsp;बहुत सारी अच्छी बातें सुनने को मिलीं । हम लोग लंबे समय तक एक दूसरे के मित्र रहे। उनके दिवंगत होने से साथ छूट गया जो कि बहुत कष्ट देता है। &nbsp; &nbsp;</p><p>मैनेजर पांडेय की पुत्री और लेखक रेखा पांडे ने मैनेजर पांडेय से जुड़ी बातों को साझा किया कि वे बहुत ही सधे नजरिये सब कुछ समझा देते थे। आज मैं भी शिक्षण के पेशे में हूं तो जो कुछ समझा अपने पिता से ही समझा। उन्होंने कहा कि आज यहां उपस्थित सभी वक्ताओं को धन्यवाद दिया और कहा कि यहां मुझे बहुत कुछ सुनने को मिला आप सभी ने आत्मीयता से पांडेय जी को याद किया यह मेरे लिए मायने रखता है। इस अवसर पर संगोष्ठी में प्रबुद्धजनों की उपस्थिति बनी रही। कार्यक्रम का संचालन कथाकार संपादक अशोक मिश्र ने किया।</p> ]]>
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        <language>en</language>
        <pubDate>Tue, 11 07, 2023 06:03 pm</pubDate>
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                <![CDATA[ मैनेजर पांडेय ने साहित्य के माध्यम से क्रांति का स्वप्न देखा – गोपेश्वर सिंह ]]>
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                <![CDATA[ <p>नयी दिल्ली – हिंदी के वरिष्ठ आलोचक गोपेश्वर सिंह ने कहा कि साहित्य के माध्यम से क्रांति का स्वप्न देखा जा सकता है । यह मैनेजर पांडेय की पहली पुस्तक शब्द और कर्म में लिखा है। पांडेय ने साहित्य के माध्यम से क्रांति का स्वप्न देखा और देखना सिखाया। उन्होंने कहा कि पांडेय ने साहित्य में समाजिकता को रेखांकित करने का काम किया। दलित साहित्य पर कोई आलोचक बात नहीं करता पांडेय ने इस पर बात की । वे मार्क्सवादी विचारधारा का विकल्प क्या हो इसकी खोज करते रहे। गोपेश्वर सिंह ने यह बात बीती शाम साहित्य अकादेमी सभागार में आयोजित हिंदी आलोचना में मैनेजर पांडेय का योगदान संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में विचार व्यक्त करते हुए कही । संगोष्ठी का आयोजन वाणी प्रकाशन ग्रुप द्वारा मैनेजर पांडेय की पहली पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर किया।&nbsp;</p><p>संगोष्ठी की शुरुआत में वाणी प्रकाशन ग्रुप से प्रकाशित प्रो. सरवरुल हुदा की संपादित पुस्तक हमने जाती हुई दुनिया को पुकारा ही नहीं (मैनेजर पांडेय को याद करते हुए) का लोकार्पण किया गया । इससे पहले सभागार में उपस्थित सभी अतिथि वक्ताओं का स्वागत वाणी प्रकाशन ग्रुप की प्रंबध निदेशक अदिति माहेश्वरी द्वारा पौधे भेंट कर किया गया।&nbsp;</p><figure class="image"><img src="https://www.frontlist.in/storage/ckeditor/1699340775_मैनेजर_पांडेय_ने_साहित्य_के_माध्यम_से_क्रांति_का_स्वप्न_देखा_–_गोपेश्वर_सिंह__Frontlist_(1).jpg"></figure><p>लोकार्पित के पश्चात बोलते हुए संपादक सरवरुल हुदा ने कहा कि यह किताब चंद दिनों का नतीजा नहीं है । हिंदी में आलोचना की भाषा पर विचार-विमर्श नहीं हुआ। हम जो छपता है उसे आलोचना मान लेते हैं। एक आलोचक के रूप में पांडेय जी से क्या मिला है इस पर चर्चा होनी चाहिए। हुदा ने कहा कि मुझे पांडेय से बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। पांडेय की याद हर दिन आती है ।&nbsp;</p><p>मैनेजर पांडेय के छात्र रहे कवि आलोचक जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि पांडेय जी कहते थे कि आलोचक के पास ठोस तर्क होना चाहिए सहमति के लिए भी, असहमति के लिए भी। वे ढर्रेवादी आलोचक नहीं थे। उन्होंने हिंदी जगत &nbsp;को बताया कि विभाजन पर अज्ञेय की 8 कविताएं हैं। जब अन्य आलोचक कहानी, उपन्यास, कविता पर लिख रहे थे तब पांडेय ने हिंदी आलोचना की ताकत और विवेक पर लिखा। उन्होंने इतिहास, वर्तमान और भविष्य को देखने की दृष्टि विकसित की। जनभाषा में काम किया। पांडेय की आलोचना रेंज बहुत बड़ी थी ।&nbsp;</p><figure class="image"><img src="https://www.frontlist.in/storage/ckeditor/1699340797_मैनेजर_पांडेय_ने_साहित्य_के_माध्यम_से_क्रांति_का_स्वप्न_देखा_–_गोपेश्वर_सिंह__Frontlist_(2).jpg"></figure><p>कवि कथाकार कमलेश भट्ट कमल ने अपना एक संस्मरण साझा करते हुए कहा कि एक रात बरेली में मैनेजर पांडेय जी &nbsp;के आतिथ्य का मौका मिला क्योंकि अगले दिन पांडेय जी को सुधीर विद्यार्थी की किताब का लोकार्पण करना था। पांडेय ने मुझे विस्तार से लेखन में सफलता और सार्थकता का अंतर समझाया और यहीं से मेरे सोचने का नजरिया ही बदल गया। भट्ट ने पांडेय के बारे में एक और बात कही कि उनकी बातचीत की भी एक अलग देहभाषा थी। कोलकाता से आए पांडेय के छात्र ज्योतिमय बाग ने एक शिक्षक के रूप में पांडेय का स्मरण किया।&nbsp;</p><p>कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे लेखक और शिक्षाविद् सदीकुर रहमान किदवई ने कहा कि आज मुझे &nbsp;बहुत सारी अच्छी बातें सुनने को मिलीं । हम लोग लंबे समय तक एक दूसरे के मित्र रहे। उनके दिवंगत होने से साथ छूट गया जो कि बहुत कष्ट देता है। &nbsp; &nbsp;</p><p>मैनेजर पांडेय की पुत्री और लेखक रेखा पांडे ने मैनेजर पांडेय से जुड़ी बातों को साझा किया कि वे बहुत ही सधे नजरिये सब कुछ समझा देते थे। आज मैं भी शिक्षण के पेशे में हूं तो जो कुछ समझा अपने पिता से ही समझा। उन्होंने कहा कि आज यहां उपस्थित सभी वक्ताओं को धन्यवाद दिया और कहा कि यहां मुझे बहुत कुछ सुनने को मिला आप सभी ने आत्मीयता से पांडेय जी को याद किया यह मेरे लिए मायने रखता है। इस अवसर पर संगोष्ठी में प्रबुद्धजनों की उपस्थिति बनी रही। कार्यक्रम का संचालन कथाकार संपादक अशोक मिश्र ने किया।</p> ]]>
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            <category>Publisher Event</category>
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