<rss version="2.0">
    <channel>
        <title>
            <![CDATA[ “आओ चलें” की पुस्तक के लेखक डॉ. पंकज सूदन के साथ साक्षात्कार ]]>
        </title>
        <link>
            <![CDATA[ https://www.frontlist.in/public/aao-chalein-book-author-dr-pankaj-sudan-interview ]]>
        </link>
        <description>
            <![CDATA[ <p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;आपने "चम्पू काव्य" जैसी दुर्लभ और कठिन विधा को चुना, जबकि पिछले 2000 सालों में मुश्किल से 285 किताबें ही इस शैली में लिखी गई हैं। क्या यह जोखिम भरा फैसला नहीं था, और गद्य को भी काव्यात्मक लय में ढालने का विचार आपके मन में कैसे आया?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>समूचे विश्व में साहित्य अधिकतर गद्य या पद्य में ही उपलब्ध है, चाहे वो पाश्चात्य साहित्य हो या प्राच्य। चम्पू केवल भारत की ही देन है। इसमें गद्य और पद्य का मिश्रण किया जाता है। साहित्य के जिस भाग में कुछ वर्णन करना हो वहां गद्य और जहाँ भावपूर्ण कुछ लिखना हो वहां पद्य का प्रयोग कर के रचना को समग्र और आकर्षक बनाया जाता है। इसीलिए मैंने इस विधा में यह पुस्तक लिखी ताकि एक अनूठे प्रयोग के साथ साथ रचना के सौंदर्य और माधुर्य में वृद्धि हो। अत्यंत प्राचीन काल में अथर्ववेद में इसका प्रयोग दृष्टिगोचर होता है और फिर बौद्ध जातक कथाओं में भी इसमें रचनाएँ मिलती हैं। लेकिन साहित्यकार इसको लिखने में आने वाली कठिनाइयों के कारण ही इससे दूरी बनाये रखते हैं। मुझे कुछ भिन्न लिखना था अस्तु कथा - वस्तु और शैली दोनों में ही कुछ अलग करने के लिए मैंने चम्पू शैली अपनायी। और जो कुछ अलग होने या अलग करने का साहस करते हैं वो “जोखिम भरे फैसलों” की परवाह नहीं करते।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;रमता जोगी और चिपकु लाल - गुरु-शिष्य की यह जोड़ी समोसे और आलू की टिक्की जैसी जगहों पर घूमती हुई ज्ञान बांटती है। क्या यह किरदार आपके अपने हिमालय प्रवास के अनुभवों से प्रेरित हैं, या यह पूरी तरह काल्पनिक सृजन है?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>रमता जोगी और चपकु लाल पूरी पुस्तक में सिर्फ खाने पीने की जगहों के इर्दगिर्द ही घूमते नज़र आते हैं क्योंकि सच्चा ज्ञान तभी दिया जाता है जब इन्द्रियों में हलचल हो, जब हम भोग और मस्ती में मशगूल हों। किसी सोफे पे बैठ के सुस्त लोग, मानसिक अक्रियता की अवस्था में, अतिसूक्ष्म बातों का मर्म कैसे समझेंगे? जब भावना प्रबल हो, इन्द्रियां सक्रिय हों, तभी अचानक आत्म - दृष्टि जागृत हो जाए, यह संभावना होती है। श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता ज्ञान राजमहल की किसी आरामगाह में नहीं दिया था बल्कि युद्ध की उथल पुथल में दिया था। विश्व में किसी भी योगी या ज्ञानी को परम ज्ञान अक्रिय अवस्था में नहीं बल्कि किसी प्रक्रिया के प्रति जागृत होने और उसकी तह तक जाने से ही मिला है।</p><p>फिर इसका एक अन्य कारण भी था। दार्शनिक विषय इतने गुह्य और गंभीर होते हैं कि पाठक या श्रोता उनसे शीघ्र ही उखड़ जाते हैं। इसीलिए इस पुस्तक की कथावस्तु मनोरंजक और साधारण से दिखने वाले रोजमर्रा के पलों से जोड़ के रची गयी है। पाठक ऐसे बैकग्राउंड से आसानी से आइडेंटीफाई कर पायेंगें और इसी कारण अंदर छपे मर्म को ग्रहण कर पाएंगे।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;"बेकार" चैप्टर में आपने बड़ी दिलचस्प बात कही है कि लोग अपनी "पुरानी टूटी-फूटी नाव" में बैठे रहना चाहते हैं, नए अनुभव से डरते हैं। आज के दौर में यह डर आपको सबसे ज़्यादा किन रूपों में दिखता है?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>“बेकार” शीर्षक वाले चैप्टर में इस मनोवैज्ञानिक सत्य की ओर इशारा किया गया है कि अचेतन मन सदा किसी भिन्न परिस्थिति या घटना से भयाक्रांत रहता है। वह इसीलिए अपने खोल में या अपनी बनायीं बेड़ियों में कैद रहता है और “नए” से दूरी बनाये रखता है। यही प्रवृत्ति कई मानसिक रोगों और अक्षमताओं को जन्म देती है। नोट करने वाली बात यह है कि चैप्टर में ऐसे व्यक्ति का नाम “पुरातन” रखा गया है क्योंकि ऐसे लोग सदा अतीत द्वारा संचालित और प्रभावित होते हैं। वह डिप्रेशन का शिकार दिखाया गया है। उसका मित्र ऐसी प्रवृत्तियों से मुक्त है और उसकी मदद करना चाहता है। उसका नाम है “नवीन”। देखिये, पात्रों के नाम भी बड़ी सतर्कता से और अर्थपूर्ण तरीके से रखे गए हैं।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;"रीस की टीस" चैप्टर में आपने ईर्ष्या को "धीमी सुलगती आग" कहा है, जबकि गुस्से को क्षणिक बताया है। क्या आपको लगता है कि सोशल मीडिया के दौर में यह "धीमी आग" पहले से ज़्यादा तेज़ी से फैल रही है?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>“रीस की टीस” चैप्टर में दूसरों की देखा देखी करने और बिना सोचे समझे उनकी नकल करने की समस्या को उठाया गया है। बचपन से ही प्रतियोगिता पर ज़ोर दिया जाता है और बड़े होते होते हम ज़िन्दगी को रेस मानने लग जाते हैं और कनखियों से देखते रहते हैं कि दूसरे कहाँ हैं? कहीं कोई हमसे आगे तो नहीं निकल जा रहा? यही प्रवृत्ति सड़क पर रोड रेज के रूप में उजागर होती हैं और परिवारों के भीतर पति - पत्नी के अनावश्यक और निरर्थक विवादों में। यहाँ भी मसला वही है कि कहीं दूसरा तो बाज़ी नहीं मार रहा, कहीं हम हारे हुए तो नहीं?</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;आपने लिखा है कि "मैं" यानी अहम् किसी और की अहमियत को मान ही नहीं सकता, इसलिए संसार में झगड़े हैं। तो क्या आपकी नज़र में विनम्रता सीखी जा सकती है, या यह सिर्फ आत्म-बोध से ही अपने आप आती है?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>आपके प्रश्न का आंशिक उत्तर तो ऊपर दिया ही जा चुका है। विनम्रता ओढ़ी नहीं जा सकती। ईगो जब तक मुखर है, विनम्रता वहां हो ही नहीं सकती। सच्ची विनम्रता तो “मैं” के लोप होने से ही प्रकट होती है, उससे पहले नहीं। ईगो की सक्रियता में विनम्रता केवल प्रदर्शित की जा सकती है जैसा कि कुटिल और ढोंगी लोग करते ही हैं। विनम्रता दिखाने की चीज़ नहीं है। यह तो स्वयं उत्कीर्ण होने वाली दशा है जैसे सूर्य से गर्मी या प्रकाश स्वयं विकरित होता रहता है। ईगो जब किसी से कुछ काम निकालने की जुगत में रहती है तो निश्चित तौर पर छद्म विनम्रता का जामा पहन लेती है। आत्म - बोध ही विनम्रता का स्रोत है।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;"आओ चलें" गीत बार-बार किताब में दोहराया गया है और यह वैदिक "चरैवेति चरैवेति" से जुड़ा है। इस एक पंक्ति को आप पूरी किताब की आत्मा मानते हैं - क्या यही वजह है कि आपने इसे किताब का शीर्षक भी बनाया?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>निश्चित तौर पर। “आओ चलें” ही इस पुस्तक की आत्मा है। यही वैदिक ज्ञान का सार है। आज मनोविज्ञान की लेटेस्ट खोजें भी प्रवाह की उपयोगिता की पुष्टि ही कर रही हैं। एक हंगेरियन - अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे जिनका नाम है - मिहाली रोबर्ट सिक्स्जेंटमिहाली। वे मनोविज्ञान के विशिष्ट प्रोफ़ेसर थे और यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो में मनोविज्ञान विभाग के प्रमुख थे। उन्होंने एक मनोवैज्ञानिक अवस्था की पहचान की जो उच्च एकाग्रता की अवस्था है जिसमें क्रिएटिविटी सर्वोत्तम स्तर पर होती है जिसे उन्होंने नाम दिया - “प्रवाह” जिसमें ज्ञाता ज्ञेय और ज्ञान एक अभिन्न अद्वैत अवस्था में होते हैं और भूख, प्यास, समय का भान और आस पास के परिवेश की विस्मृति - ये सब विलुप्त हो जाते हैं। हमारे तो वेदों ने सदियों पहले ही “चरैवेति चरैवेति” - यानि चलते रहो, चलते रहो यानी सदा प्रवाह को अक्षुण्ण बनाये रखो - का दिव्य ज्ञान दे दिया था।</p><p>उसी ज्ञान को मैं अपनी इस “आओ चलें” नाम की इस पुस्तक की मदद से फिर से आधुनिक भाषा में सरल तरीके से प्रस्तुत कर रहा हूँ।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;आपकी सूची में "ज़ोम्बी जगत" जैसा एक बिल्कुल अलग और आधुनिक शीर्षक भी है, बाकी अध्यायों के मुकाबले। इस चैप्टर का विषय क्या है, और यह नाम आपने क्यों चुना?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>“ज़ोम्बी जगत” चैप्टर में मैंने यह संकेत दिया है कि आज का मानव लगभग एक ज़ोम्बी ही बन कर जी रहा है। ज़ोम्बी यानी अर्धमृत या अर्धजीवित - एक ऐसा व्यक्ति जो ओवर थिंकिंग से ग्रस्त है और एक रोबोट की तरह इधर उधर घूम रहा है। उसकी ज़िन्दगी में कोई बोध नहीं, कोई नवीनता नहीं, बस यांत्रिक रूटीन विचार हैं, रूटीन जॉब है, रूटीन घिसी पिटी प्रक्रियाएं हैं। वह नवीन परिस्थितियों से आक्रान्त होता है, लीक से हट कर सोच या जी नहीं पाता। वह एक ज़ोम्बी ही तो है। केवल “मैं” रहित, स्वयं द्वारा निर्मित बेड़ियों से मुक्त और पहले से रिकॉर्डेड पैटर्न्स से मुक्त - स्वतंत्र सोच वाले और क्षुद्र मानसिकता से दूर व्यक्ति ही हैं, जो ज़ोम्बी नहीं हैं।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;आपने त्रिविक्रम भट्ट के "नल चम्पू" और मैथिलीशरण गुप्त की "यशोधरा" का ज़िक्र किया है - इन दोनों कालजयी रचनाओं से आपकी किताब किस तरह प्रेरित है, और किस तरह अलग रास्ता अपनाती है?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>मैंने अपनी पुस्तक किसी अन्य पुस्तक जैसे त्रिविक्रम भट्ट की “नल चम्पू” अथवा मैथिलीशरण गुप्त की “यशोधरा” से प्रभावित हो के नहीं लिखी। दरअसल मैंने इन दोनों पुस्तकों या चम्पू साहित्य में लिखी गयी किसी भी पुस्तक को नहीं पढ़ा। मेरी पुस्तक ओरिजनल है और स्वतः अनुभूत प्रेरणा से सृजन की गयी है। जब हम किसी विचार या साहित्य से प्रभावित होते हैं, चाहे कितने ही सूक्ष्म या अल्प स्तर पर ही क्यों न हों, तो हमारी लेखनी पर उस प्रभाव की एक रंगत चढ़ ही जाती है। तब वह पूर्णतया ओरिजनल नहीं रह पाती। इसीलिए मैं किसी से भी, किसी भी स्तर पर, किसी भी रूप में, प्रभावित न होऊं - इस बारे में सजग रहता हूँ।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;आपने दो दशकों तक श्री रामकृष्ण आश्रम में मुफ़्त ध्यान कक्षाएं चलाईं। उन हज़ारों लोगों के साथ हुए संवादों में से क्या कोई ऐसा वाकया है जो सीधे "आओ चलें" के किसी अध्याय में ढल गया हो?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>ध्यान प्रशिक्षकों को शुल्क इस लिए लेना पड़ता है क्योंकि उन्हें व्यक्तिगत परिवार अथवा प्रशिक्षणार्थियों के परिवार के लिए, जो वहां सीखने आते हैं, बंदोबस्त करना होता है। किसी भी संस्थागत प्रशिक्षण के लिए और संस्था को चलाने के भी लिए आर्थिक ज़रूरतें होती ही हैं। मेरे साथ ऐसा नहीं था। अतएव मैं बीस वर्ष के लम्बे समय के लिए निःशुल्क कक्षाएं चला पाया।</p><p>इन प्रशिक्षणों के दौरान ऐसे तो कई घटनाएं घटित हुईं थीं जिन्होंने मेरी इस पुस्तक या अन्य पुस्तकों की कथा - वस्तु को उत्प्रेरित किया पर एक विशेष घटना मुझे याद आती है। मेरठ के एक प्रख्यात संगठन की अध्यक्षा एक बार हमारे आश्रम में आयीं और अपनी एक विशेष मानसिक समस्या का निदान हमारे द्वारा आध्यात्मिक तरीके से चाहा। उनकी समस्या को मैंने आसानी से हल कर दिया। चूँकि मैं बहुत से उदाहरण देता हूँ और तब भी मैंने देशी घी को बनाने की प्रक्रिया के उदाहरण से उनकी समस्या हल कर दी तो मुझे यह उपयुक्त लगा कि इस पुस्तक में भी उसे जगह दी जाए। “आओ चलें” में “देशी घी” नाम से जो चैप्टर है वह यही सच्ची घटना है।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;किताब हास्य और गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान का मेल है - आपको क्या लगता है, पाठक इसे पहले एक मज़ेदार कहानी की तरह पढ़ें, या शुरू से ही इसमें छिपे दार्शनिक संदेश खोजने की कोशिश करें?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>पाठक यदि पहले “आओ चलें” को कहानी के रूप में पढ़ें और फिर इसके चैप्टरों में छपे मर्म या ज्ञान - बिंदुओं को खोजें तो यह प्रक्रिया बेमानी हो जायेगी। भारतीय दर्शन भेद में विश्वास नहीं रखता। हम तो अद्वैत वाले हैं। एक के बाद एक - यह तो समय है, समय की पहचान और परिभाषा है। क्रम से तो समय चलता है। यह ज्ञान अद्वैत यानी समयातीत है। इसलिए कहानी की तरह पढ़ें और एक नज़र सन्निहित अर्थ पर भी रखें। सड़क पर कार या बाइक चलाते वक़्त हम सामने ही नहीं देखते, कनखियों से अगल बगल भी देखते हैं। तभी तो एक्सीडेंट से बच पाते हैं। दोनों कार्य एक साथ होंगें। बुक उपन्यास की तरह पढ़िए। उसके प्रवाह का, कविताओं के बहाव का, मज़ा भी लें और इस आनंद उपभोग में अर्थ भी ढूंढें। यही तो वह कारण है कि इस पुस्तक में रमता जोगी और चपकु लाल रेस्टोरेंट्स के&nbsp; इर्दगिर्द ही घूमते मिलेंगे। भोग में योग को देख लेना ही सम्यक दृष्टि है। ईशावास्योपनिषद का प्रथम श्लोक ही कहता है - “तेन त्यक्तेन भुंजीथा” अर्थात उन (पदार्थ से मोह) का त्याग कर के उन्हें भोग करो। मैंने कोई अलग बात थोड़े ही कही है।</p> ]]>
        </description>
        <language>en</language>
        <pubDate>Mon, 10 26, 2026 09:00 am</pubDate>
        <item>
            <title>
                <![CDATA[ “आओ चलें” की पुस्तक के लेखक डॉ. पंकज सूदन के साथ साक्षात्कार ]]>
            </title>
            <link><![CDATA[ https://www.frontlist.in/public/aao-chalein-book-author-dr-pankaj-sudan-interview ]]></link>
            <description>
                <![CDATA[ <p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;आपने "चम्पू काव्य" जैसी दुर्लभ और कठिन विधा को चुना, जबकि पिछले 2000 सालों में मुश्किल से 285 किताबें ही इस शैली में लिखी गई हैं। क्या यह जोखिम भरा फैसला नहीं था, और गद्य को भी काव्यात्मक लय में ढालने का विचार आपके मन में कैसे आया?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>समूचे विश्व में साहित्य अधिकतर गद्य या पद्य में ही उपलब्ध है, चाहे वो पाश्चात्य साहित्य हो या प्राच्य। चम्पू केवल भारत की ही देन है। इसमें गद्य और पद्य का मिश्रण किया जाता है। साहित्य के जिस भाग में कुछ वर्णन करना हो वहां गद्य और जहाँ भावपूर्ण कुछ लिखना हो वहां पद्य का प्रयोग कर के रचना को समग्र और आकर्षक बनाया जाता है। इसीलिए मैंने इस विधा में यह पुस्तक लिखी ताकि एक अनूठे प्रयोग के साथ साथ रचना के सौंदर्य और माधुर्य में वृद्धि हो। अत्यंत प्राचीन काल में अथर्ववेद में इसका प्रयोग दृष्टिगोचर होता है और फिर बौद्ध जातक कथाओं में भी इसमें रचनाएँ मिलती हैं। लेकिन साहित्यकार इसको लिखने में आने वाली कठिनाइयों के कारण ही इससे दूरी बनाये रखते हैं। मुझे कुछ भिन्न लिखना था अस्तु कथा - वस्तु और शैली दोनों में ही कुछ अलग करने के लिए मैंने चम्पू शैली अपनायी। और जो कुछ अलग होने या अलग करने का साहस करते हैं वो “जोखिम भरे फैसलों” की परवाह नहीं करते।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;रमता जोगी और चिपकु लाल - गुरु-शिष्य की यह जोड़ी समोसे और आलू की टिक्की जैसी जगहों पर घूमती हुई ज्ञान बांटती है। क्या यह किरदार आपके अपने हिमालय प्रवास के अनुभवों से प्रेरित हैं, या यह पूरी तरह काल्पनिक सृजन है?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>रमता जोगी और चपकु लाल पूरी पुस्तक में सिर्फ खाने पीने की जगहों के इर्दगिर्द ही घूमते नज़र आते हैं क्योंकि सच्चा ज्ञान तभी दिया जाता है जब इन्द्रियों में हलचल हो, जब हम भोग और मस्ती में मशगूल हों। किसी सोफे पे बैठ के सुस्त लोग, मानसिक अक्रियता की अवस्था में, अतिसूक्ष्म बातों का मर्म कैसे समझेंगे? जब भावना प्रबल हो, इन्द्रियां सक्रिय हों, तभी अचानक आत्म - दृष्टि जागृत हो जाए, यह संभावना होती है। श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता ज्ञान राजमहल की किसी आरामगाह में नहीं दिया था बल्कि युद्ध की उथल पुथल में दिया था। विश्व में किसी भी योगी या ज्ञानी को परम ज्ञान अक्रिय अवस्था में नहीं बल्कि किसी प्रक्रिया के प्रति जागृत होने और उसकी तह तक जाने से ही मिला है।</p><p>फिर इसका एक अन्य कारण भी था। दार्शनिक विषय इतने गुह्य और गंभीर होते हैं कि पाठक या श्रोता उनसे शीघ्र ही उखड़ जाते हैं। इसीलिए इस पुस्तक की कथावस्तु मनोरंजक और साधारण से दिखने वाले रोजमर्रा के पलों से जोड़ के रची गयी है। पाठक ऐसे बैकग्राउंड से आसानी से आइडेंटीफाई कर पायेंगें और इसी कारण अंदर छपे मर्म को ग्रहण कर पाएंगे।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;"बेकार" चैप्टर में आपने बड़ी दिलचस्प बात कही है कि लोग अपनी "पुरानी टूटी-फूटी नाव" में बैठे रहना चाहते हैं, नए अनुभव से डरते हैं। आज के दौर में यह डर आपको सबसे ज़्यादा किन रूपों में दिखता है?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>“बेकार” शीर्षक वाले चैप्टर में इस मनोवैज्ञानिक सत्य की ओर इशारा किया गया है कि अचेतन मन सदा किसी भिन्न परिस्थिति या घटना से भयाक्रांत रहता है। वह इसीलिए अपने खोल में या अपनी बनायीं बेड़ियों में कैद रहता है और “नए” से दूरी बनाये रखता है। यही प्रवृत्ति कई मानसिक रोगों और अक्षमताओं को जन्म देती है। नोट करने वाली बात यह है कि चैप्टर में ऐसे व्यक्ति का नाम “पुरातन” रखा गया है क्योंकि ऐसे लोग सदा अतीत द्वारा संचालित और प्रभावित होते हैं। वह डिप्रेशन का शिकार दिखाया गया है। उसका मित्र ऐसी प्रवृत्तियों से मुक्त है और उसकी मदद करना चाहता है। उसका नाम है “नवीन”। देखिये, पात्रों के नाम भी बड़ी सतर्कता से और अर्थपूर्ण तरीके से रखे गए हैं।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;"रीस की टीस" चैप्टर में आपने ईर्ष्या को "धीमी सुलगती आग" कहा है, जबकि गुस्से को क्षणिक बताया है। क्या आपको लगता है कि सोशल मीडिया के दौर में यह "धीमी आग" पहले से ज़्यादा तेज़ी से फैल रही है?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>“रीस की टीस” चैप्टर में दूसरों की देखा देखी करने और बिना सोचे समझे उनकी नकल करने की समस्या को उठाया गया है। बचपन से ही प्रतियोगिता पर ज़ोर दिया जाता है और बड़े होते होते हम ज़िन्दगी को रेस मानने लग जाते हैं और कनखियों से देखते रहते हैं कि दूसरे कहाँ हैं? कहीं कोई हमसे आगे तो नहीं निकल जा रहा? यही प्रवृत्ति सड़क पर रोड रेज के रूप में उजागर होती हैं और परिवारों के भीतर पति - पत्नी के अनावश्यक और निरर्थक विवादों में। यहाँ भी मसला वही है कि कहीं दूसरा तो बाज़ी नहीं मार रहा, कहीं हम हारे हुए तो नहीं?</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;आपने लिखा है कि "मैं" यानी अहम् किसी और की अहमियत को मान ही नहीं सकता, इसलिए संसार में झगड़े हैं। तो क्या आपकी नज़र में विनम्रता सीखी जा सकती है, या यह सिर्फ आत्म-बोध से ही अपने आप आती है?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>आपके प्रश्न का आंशिक उत्तर तो ऊपर दिया ही जा चुका है। विनम्रता ओढ़ी नहीं जा सकती। ईगो जब तक मुखर है, विनम्रता वहां हो ही नहीं सकती। सच्ची विनम्रता तो “मैं” के लोप होने से ही प्रकट होती है, उससे पहले नहीं। ईगो की सक्रियता में विनम्रता केवल प्रदर्शित की जा सकती है जैसा कि कुटिल और ढोंगी लोग करते ही हैं। विनम्रता दिखाने की चीज़ नहीं है। यह तो स्वयं उत्कीर्ण होने वाली दशा है जैसे सूर्य से गर्मी या प्रकाश स्वयं विकरित होता रहता है। ईगो जब किसी से कुछ काम निकालने की जुगत में रहती है तो निश्चित तौर पर छद्म विनम्रता का जामा पहन लेती है। आत्म - बोध ही विनम्रता का स्रोत है।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;"आओ चलें" गीत बार-बार किताब में दोहराया गया है और यह वैदिक "चरैवेति चरैवेति" से जुड़ा है। इस एक पंक्ति को आप पूरी किताब की आत्मा मानते हैं - क्या यही वजह है कि आपने इसे किताब का शीर्षक भी बनाया?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>निश्चित तौर पर। “आओ चलें” ही इस पुस्तक की आत्मा है। यही वैदिक ज्ञान का सार है। आज मनोविज्ञान की लेटेस्ट खोजें भी प्रवाह की उपयोगिता की पुष्टि ही कर रही हैं। एक हंगेरियन - अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे जिनका नाम है - मिहाली रोबर्ट सिक्स्जेंटमिहाली। वे मनोविज्ञान के विशिष्ट प्रोफ़ेसर थे और यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो में मनोविज्ञान विभाग के प्रमुख थे। उन्होंने एक मनोवैज्ञानिक अवस्था की पहचान की जो उच्च एकाग्रता की अवस्था है जिसमें क्रिएटिविटी सर्वोत्तम स्तर पर होती है जिसे उन्होंने नाम दिया - “प्रवाह” जिसमें ज्ञाता ज्ञेय और ज्ञान एक अभिन्न अद्वैत अवस्था में होते हैं और भूख, प्यास, समय का भान और आस पास के परिवेश की विस्मृति - ये सब विलुप्त हो जाते हैं। हमारे तो वेदों ने सदियों पहले ही “चरैवेति चरैवेति” - यानि चलते रहो, चलते रहो यानी सदा प्रवाह को अक्षुण्ण बनाये रखो - का दिव्य ज्ञान दे दिया था।</p><p>उसी ज्ञान को मैं अपनी इस “आओ चलें” नाम की इस पुस्तक की मदद से फिर से आधुनिक भाषा में सरल तरीके से प्रस्तुत कर रहा हूँ।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;आपकी सूची में "ज़ोम्बी जगत" जैसा एक बिल्कुल अलग और आधुनिक शीर्षक भी है, बाकी अध्यायों के मुकाबले। इस चैप्टर का विषय क्या है, और यह नाम आपने क्यों चुना?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>“ज़ोम्बी जगत” चैप्टर में मैंने यह संकेत दिया है कि आज का मानव लगभग एक ज़ोम्बी ही बन कर जी रहा है। ज़ोम्बी यानी अर्धमृत या अर्धजीवित - एक ऐसा व्यक्ति जो ओवर थिंकिंग से ग्रस्त है और एक रोबोट की तरह इधर उधर घूम रहा है। उसकी ज़िन्दगी में कोई बोध नहीं, कोई नवीनता नहीं, बस यांत्रिक रूटीन विचार हैं, रूटीन जॉब है, रूटीन घिसी पिटी प्रक्रियाएं हैं। वह नवीन परिस्थितियों से आक्रान्त होता है, लीक से हट कर सोच या जी नहीं पाता। वह एक ज़ोम्बी ही तो है। केवल “मैं” रहित, स्वयं द्वारा निर्मित बेड़ियों से मुक्त और पहले से रिकॉर्डेड पैटर्न्स से मुक्त - स्वतंत्र सोच वाले और क्षुद्र मानसिकता से दूर व्यक्ति ही हैं, जो ज़ोम्बी नहीं हैं।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;आपने त्रिविक्रम भट्ट के "नल चम्पू" और मैथिलीशरण गुप्त की "यशोधरा" का ज़िक्र किया है - इन दोनों कालजयी रचनाओं से आपकी किताब किस तरह प्रेरित है, और किस तरह अलग रास्ता अपनाती है?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>मैंने अपनी पुस्तक किसी अन्य पुस्तक जैसे त्रिविक्रम भट्ट की “नल चम्पू” अथवा मैथिलीशरण गुप्त की “यशोधरा” से प्रभावित हो के नहीं लिखी। दरअसल मैंने इन दोनों पुस्तकों या चम्पू साहित्य में लिखी गयी किसी भी पुस्तक को नहीं पढ़ा। मेरी पुस्तक ओरिजनल है और स्वतः अनुभूत प्रेरणा से सृजन की गयी है। जब हम किसी विचार या साहित्य से प्रभावित होते हैं, चाहे कितने ही सूक्ष्म या अल्प स्तर पर ही क्यों न हों, तो हमारी लेखनी पर उस प्रभाव की एक रंगत चढ़ ही जाती है। तब वह पूर्णतया ओरिजनल नहीं रह पाती। इसीलिए मैं किसी से भी, किसी भी स्तर पर, किसी भी रूप में, प्रभावित न होऊं - इस बारे में सजग रहता हूँ।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;आपने दो दशकों तक श्री रामकृष्ण आश्रम में मुफ़्त ध्यान कक्षाएं चलाईं। उन हज़ारों लोगों के साथ हुए संवादों में से क्या कोई ऐसा वाकया है जो सीधे "आओ चलें" के किसी अध्याय में ढल गया हो?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>ध्यान प्रशिक्षकों को शुल्क इस लिए लेना पड़ता है क्योंकि उन्हें व्यक्तिगत परिवार अथवा प्रशिक्षणार्थियों के परिवार के लिए, जो वहां सीखने आते हैं, बंदोबस्त करना होता है। किसी भी संस्थागत प्रशिक्षण के लिए और संस्था को चलाने के भी लिए आर्थिक ज़रूरतें होती ही हैं। मेरे साथ ऐसा नहीं था। अतएव मैं बीस वर्ष के लम्बे समय के लिए निःशुल्क कक्षाएं चला पाया।</p><p>इन प्रशिक्षणों के दौरान ऐसे तो कई घटनाएं घटित हुईं थीं जिन्होंने मेरी इस पुस्तक या अन्य पुस्तकों की कथा - वस्तु को उत्प्रेरित किया पर एक विशेष घटना मुझे याद आती है। मेरठ के एक प्रख्यात संगठन की अध्यक्षा एक बार हमारे आश्रम में आयीं और अपनी एक विशेष मानसिक समस्या का निदान हमारे द्वारा आध्यात्मिक तरीके से चाहा। उनकी समस्या को मैंने आसानी से हल कर दिया। चूँकि मैं बहुत से उदाहरण देता हूँ और तब भी मैंने देशी घी को बनाने की प्रक्रिया के उदाहरण से उनकी समस्या हल कर दी तो मुझे यह उपयुक्त लगा कि इस पुस्तक में भी उसे जगह दी जाए। “आओ चलें” में “देशी घी” नाम से जो चैप्टर है वह यही सच्ची घटना है।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट:&nbsp;किताब हास्य और गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान का मेल है - आपको क्या लगता है, पाठक इसे पहले एक मज़ेदार कहानी की तरह पढ़ें, या शुरू से ही इसमें छिपे दार्शनिक संदेश खोजने की कोशिश करें?</strong></p><p><strong>पंकज:&nbsp;</strong>पाठक यदि पहले “आओ चलें” को कहानी के रूप में पढ़ें और फिर इसके चैप्टरों में छपे मर्म या ज्ञान - बिंदुओं को खोजें तो यह प्रक्रिया बेमानी हो जायेगी। भारतीय दर्शन भेद में विश्वास नहीं रखता। हम तो अद्वैत वाले हैं। एक के बाद एक - यह तो समय है, समय की पहचान और परिभाषा है। क्रम से तो समय चलता है। यह ज्ञान अद्वैत यानी समयातीत है। इसलिए कहानी की तरह पढ़ें और एक नज़र सन्निहित अर्थ पर भी रखें। सड़क पर कार या बाइक चलाते वक़्त हम सामने ही नहीं देखते, कनखियों से अगल बगल भी देखते हैं। तभी तो एक्सीडेंट से बच पाते हैं। दोनों कार्य एक साथ होंगें। बुक उपन्यास की तरह पढ़िए। उसके प्रवाह का, कविताओं के बहाव का, मज़ा भी लें और इस आनंद उपभोग में अर्थ भी ढूंढें। यही तो वह कारण है कि इस पुस्तक में रमता जोगी और चपकु लाल रेस्टोरेंट्स के&nbsp; इर्दगिर्द ही घूमते मिलेंगे। भोग में योग को देख लेना ही सम्यक दृष्टि है। ईशावास्योपनिषद का प्रथम श्लोक ही कहता है - “तेन त्यक्तेन भुंजीथा” अर्थात उन (पदार्थ से मोह) का त्याग कर के उन्हें भोग करो। मैंने कोई अलग बात थोड़े ही कही है।</p> ]]>
            </description>
            <category>Author Interviews</category>
            <author>
                <![CDATA[ Frontlist ]]>
            </author>
            <guid>2</guid>
            <pubDate>Mon, 10 26, 2026 09:00 am</pubDate>
        </item>
    </channel>
</rss>
