आओ चलें
प्राचीन भारतीय ग्रंथों की कालजयी सीख को सरल भाषा में प्रस्तुत करती यह पुस्तक जीवन, संबंधों और आत्म-विकास की राह दिखाती है।on Sep 11, 2026
प्राचीन भारतीय वांग्मय काफी क्लिष्ट और गूढ़ है और आज के बदले हुए तेज़ तर्रार परिवेश में हमारे जीवन से कटा हुआ और काफी उबाऊ लगता है. ऐसा वर्तमान युवा पीढ़ी की सोच है. इसी सोच के परिशोधन के लिए हल्के फुल्के हास्य से सराबोर यह रचना वैदिक ज्ञान के मूलमंत्र - "चरैवेति, चरैवेति" को ध्यान में रख के सदा स्वयं को प्रवाह में स्थित रखने के आदर्श पर लिखी गई है.
रोजमर्रा के साधारण दैनिक अनुभवों और परिस्थितियों के बीच से यह पुस्तक पाठकों को मन के भीतर की दबी, छुपी विसंगतियों और अचेतन से उठती प्रतिक्रियाओं के प्रति जागृत करती चलती है.
इस पुस्तक में एक अद्भुत प्रवाह और गतिशीलता प्रत्येक वाक्य में अनुभव होती है और एक ऊर्जापूर्ण उत्साह का भान भी होता रहता है. इसी को देखते हुए इसे चम्पू काव्य के स्टाइल में लिखा गया है. चम्पू साहित्य की ऐसी विधा है जिसमें गद्य और पद्य दोनों एक साथ चलते हैं. मैंने इसमें थोड़ा और प्रयोग किया है. गद्य और पद्य दोनों तो हैं ही, गद्य को भी अधिकतर काव्यात्मक तुकबंदी या लय में ढाला गया है. वैसे वैदिक काल से ही इस पर रचनाएं हुई हैं. लेकिन पिछले 2000 वर्षों से चंपू विधा में केवल 285 पुस्तकों का ही संकलन किया जा सकना इस बात का द्योतक है कि यह एक काफी कठिन और दुर्लभ विधा है. सबसे पहले त्रिविक्रम भट्ट द्वारा रचित - नल चम्पू नामक ग्रन्थ का उल्लेख मिलता है. आज के दौर में तो सिर्फ मैथिलीशरण गुप्त द्वारा विरचित - यशोधरा का ही उल्लेख मिलता है.
इस पुस्तक के चैप्टरों के नाम भी काफी फन्नी रखे गए हैं - जैसे समोसा, आलू की टिक्की, ठंडी लस्सी इत्यादि. पुस्तक का नायक रमता जोगी है जिसके साथ उसका एक शिष्य चिपकु लाल खाने पीने के रेस्तरां और दुकानों के इर्द गिर्द घूमते रहते हैं और उनकी सांसारिक गतिविधियों में से ही शाश्वत ज्ञान का सूक्ष्म अहसास भी कराते चलते हैं. इस प्रकार यह पुस्तक काफी रोचक और व्यावहारिक बन पड़ी है. इसे पढ़ते समय सुधि जन कुछ अंतर्दृष्टियां भी प्राप्त कर पाएंगे यह मेरी आशा है, अन्यथा एक कथा वृतांत के रूप में तो यह पाठकों को आनन्द तो प्रदान करेगी ही.
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