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            <![CDATA[ Abdul Bismillah ]]>
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            <![CDATA[ https://www.frontlist.in/Interview-abdul-bismillah ]]>
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            <![CDATA[ <p><strong>फ्रंटलिस्ट: ‘स्मृतियों की बस्ती’ लिखते समय जब आप अपने अतीत और साहित्यिक यात्राओं को फिर से जी रहे थे, तब आपने अपने भीतर कौन-सी नई खोज की?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>यह पूरी किताब एक साथ नहीं लिखी गई। इसमें शामिल संस्मरण अलग-अलग समय पर लिखे गए हैं और जिन साहित्यकारों पर मैंने लिखा है, उनसे मेरी सिर्फ़ मुलाकातें ही नहीं थीं, बल्कि गहरा आत्मीय संबंध भी था।&nbsp;</p><p>जब भी मैं किसी लेखक पर संस्मरण लिखने बैठता था, तो उन बीते हुए क्षणों को फिर से जीना पड़ता था। उदाहरण के लिए, जब मैंने हजारीप्रसाद द्विवेदी पर संस्मरण लिखा, तो मुझे ऐसा महसूस हुआ मानो मैं फिर से उनके घर, उनके कमरे में बैठा हूँ और हम आमने-सामने बातचीत कर रहे हैं। स्मृतियाँ मुझे उसी समय और उसी वातावरण में ले जाती थीं।&nbsp;</p><p>इसी तरह, जब मैं अमृतलाल नागर के बारे में लिख रहा था, तो ऐसा लगा जैसे मैं दिल्ली में नहीं, बल्कि लखनऊ में उनके घर बैठा हूँ। संस्मरण लिखने का अर्थ ही है स्मृतियों के भीतर उतर जाना। उस समय लेखक अपने वर्तमान में नहीं रहता, बल्कि अपने मन और अनुभूति के साथ उस बीते हुए समय और स्थान में पहुँच जाता है।&nbsp;</p><p>मेरा मानना है कि यदि ऐसा न हो, तो संस्मरण बेजान हो जाएंगे। उनमें न आत्मीयता बचेगी, न जीवंतता और न ही वह आनंद, जो स्मृतियों को शब्द देने से पैदा होता है। संस्मरण तभी सजीव बनते हैं, जब लेखक का मन उन क्षणों में लौट जाए और वह उन्हें भीतर से फिर एक बार जी ले। ‘स्मृतियों की बस्ती’ लिखते हुए मेरे साथ भी यही हुआ।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: इस किताब में आपने अनेक महान साहित्यकारों को बहुत मानवीय रूप में प्रस्तुत किया है। उनके व्यक्तित्व का कौन-सा पक्ष आपको सबसे अधिक प्रभावित करता है और क्यों?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>यह बात तो किताब पढ़ने वाले पाठकों को स्वयं समझ में आएगी। इन संस्मरणों में मैंने जिन साहित्यकारों को याद किया है, उनके व्यक्तित्व के जो पक्ष मुझे प्रभावित करते रहे, वे उन्हीं संस्मरणों में निहित हैं। मेरे अलग से बताने से उसमें कुछ जुड़ नहीं जाएगा।&nbsp;</p><p>फिर भी, एक बात जो अपने से वरिष्ठ साहित्यकारों में मैंने बार-बार देखी, वह उनकी विनम्रता थी। इस गुण ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसके साथ ही वे केवल लेखक नहीं थे, बल्कि मार्गदर्शक भी थे। उनसे बातचीत के दौरान अक्सर कोई नया दृष्टिकोण, कोई नई राह या सोचने का नया तरीका मिलता था। हर व्यक्ति का अपना अलग व्यक्तित्व होता है और हर मुलाकात का असर भी अलग होता है। कई बार किसी व्यक्ति से लंबे समय तक मिलने-जुलने के बाद उसकी छवि बनती है, लेकिन कभी-कभी एक ही मुलाकात बहुत गहरी अनुभूति दे जाती है। उदाहरण के लिए, हरिवंशराय बच्चन से मेरी केवल एक ही मुलाकात हुई थी, लेकिन&nbsp;</p><p>उसी एक मुलाकात ने मुझे इतना कुछ दिया कि मैं उन पर संस्मरण लिख सका। इसलिए मुझे लगता है कि पाठक जब इन संस्मरणों को पढ़ेंगे, तो वे स्वयं महसूस कर पाएंगे कि किस साहित्यकार के व्यक्तित्व का कौन-सा पक्ष मुझे सबसे अधिक प्रभावित करता रहा।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: स्मृतियाँ अक्सर केवल घटनाएँ नहीं होतीं, वे भावनाओं का भी संग्रह होती हैं। इस किताब को लिखते हुए कोई ऐसी स्मृति रही जिसने आपको भावनात्मक रूप से सबसे अधिक स्पर्श किया हो?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​</strong>किताब में जिन साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण शामिल हैं, उनकी स्मृतियों ने मुझे भावनात्मक रूप से छुआ, तभी तो मैं उन पर लिख पाया। सच तो यह है कि सभी स्मृतियाँ किसी न किसी रूप में भावनात्मक होती हैं। यदि वे भीतर को स्पर्श न करें, तो लेखक के लिए उन पर लिखना संभव ही नहीं है।&nbsp;</p><p>अमरकांत जी पर मैंने दो संस्मरण लिखे हैं। उनसे मेरा लंबे समय तक संपर्क नहीं रह पाया था। जितनी मुलाकातें हुईं, मैं केवल उतना ही लिख सका। फिर एक लंबा अंतराल आ गया और अचानक उनके निधन का समाचार मिला। उस समय मन में बार-बार यही विचार आया कि काश, उनसे एक बार और मिलना हो गया होता। शायद कोई ऐसी बात जानने या समझने को मिल जाती जो अधूरी रह गई। ऐसी अनुभूति केवल अमरकांत जी के साथ नहीं, लगभग हर लेखक के साथ रही है। संस्मरण लिखते समय कई बार यह एहसास होता है कि कुछ और समय साथ बिताने का अवसर मिल जाता, तो शायद स्मृतियों का दायरा और विस्तृत होता।&nbsp;</p><p>हरिशंकर परसाई को याद करते हुए भी ऐसी ही भावनाएँ उभरती हैं। उनसे मेरी केवल एक मुलाकात हुई थी, लेकिन वह आज भी मुझे गहराई से आंदोलित करती है। मेरे उपन्यास ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ के प्रकाशन के बाद जब मेरे विरुद्ध प्रतिकूल परिस्थितियाँ बन गई थीं, तब परसाई जी इस बात से मुझसे भी अधिक व्यथित थे। वे दूर बैठे लोगों को पत्र लिखकर मेरी चिंता व्यक्त कर रहे थे और यह बता रहे थे कि मेरे खिलाफ़ कैसा माहौल बनाया जा रहा है। उस समय हम एक-दूसरे से दूर थे, लेकिन उनकी संवेदना और आत्मीयता लगातार मेरे साथ थी।&nbsp;</p><p>मेरे लिए यही भावनात्मकता सबसे बड़ी बात है—किसी लेखक का केवल साहित्य के माध्यम से नहीं, बल्कि मनुष्य के रूप में भी आपके जीवन से जुड़ जाना। यही वे स्मृतियाँ हैं जो आज भी भीतर तक स्पर्श करती हैं।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: आपने त्रिलोचन, अमृतलाल नागर, अमरकान्त और अन्य साहित्यकारों से जो सीखा, उनमें से कौन-सा जीवन - मूल्य आज भी आपके लेखन और जीवन का आधार बना हुआ है?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>इन साहित्यकारों से मैंने बहुत कुछ सीखा है। यह कहना कठिन है कि उनमें से कौन-सी एक बात मेरे लेखन या जीवन का आधार बन गई, क्योंकि हर व्यक्ति ने अपने ढंग से मुझे प्रभावित किया। फिर भी, कुछ मूल्य ऐसे हैं जो आज भी मेरे साथ बने हुए हैं।&nbsp;</p><p>सबसे अधिक निकटता मेरी अमरकांत जी से रही। विद्यार्थी जीवन में उनसे मेरी पहली मुलाकात हुई थी और बाद में उनसे गहरा आत्मीय संबंध बन गया। उम्र में वे मुझसे काफी बड़े थे, इसलिए उसे मित्रता कहना ठीक नहीं होगा, लेकिन जीवन के कठिन दिनों में उन्होंने जिस तरह मेरा साथ दिया, वह मैं कभी नहीं भूल सकता। जब मैं बेरोज़गार था और मेरे पास कोई काम नहीं था, तब उन्होंने अपने दफ्तर में मेरे लिए काम की व्यवस्था की। लगभग छह महीने तक मैंने उनके साथ बैठकर संपादन का कार्य किया। उनसे मैंने यह सीखा कि दूसरों की पीड़ा को केवल देखना ही नहीं, बल्कि उसके प्रति संवेदनशील होना और यथासंभव सहायता के लिए आगे आना भी ज़रूरी है। बहुत लोग किसी को दुखी देखकर सहानुभूति तो व्यक्त कर देते हैं, लेकिन सहायता के लिए ठोस प्रयास नहीं करते। अमरकांत जी ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने मेरे लिए रास्ता खोजा और मदद की।&nbsp;</p><p>दूसरी बात, जो लगभग सभी वरिष्ठ साहित्यकारों में मैंने देखी, वह उनकी विनम्रता थी। हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे महान विद्वान से पहली बार मिलने जाते हुए मुझे संकोच था कि पता नहीं वे मिलेंगे भी या नहीं। उस समय मेरी कोई विशेष पहचान भी नहीं थी। लेकिन जब उनसे मिला, तो उन्होंने औपचारिकता नहीं दिखाई, बल्कि इतने आत्मीय भाव से मिले कि मैं अभिभूत हो गया। उनकी सहजता और अपनापन आज भी याद है।&nbsp;</p><p>हरिवंशराय बच्चन के साथ भी ऐसा ही अनुभव रहा। पहली बार उनसे मिलने में कई तरह की बाधाएँ आईं, लेकिन जब मुलाकात हुई तो उन्होंने जिस आत्मीयता और विनम्रता से व्यवहार किया, वह मेरे मन में हमेशा के लिए बस गया। इतने बड़े साहित्यकार होने के बावजूद उनमें किसी प्रकार का दंभ नहीं था।&nbsp;</p><p>इन सभी अनुभवों ने मुझे यह सिखाया कि व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, उसे अहंकार से दूर रहना चाहिए। विनम्रता और अच्छा व्यवहार ही मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान हैं। मैं आज भी जब कोई नया लेखक, विद्यार्थी या पाठक मुझसे मिलने या बात करने की इच्छा व्यक्त करता है, तो उसे समय देने की कोशिश करता हूँ। इसका कारण यही है कि मैं स्वयं भी कभी उसी स्थिति में था। संघर्ष के वे दिन मैंने देखे हैं, जब रचनाएँ लौट आती थीं और पहचान बनाने के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ता था।&nbsp;</p><p>मुझे लगता है कि लेखक की महानता केवल उसके लेखन में नहीं, बल्कि उसके व्यवहार में भी दिखाई देती है। कोई व्यक्ति कितना भी बड़ा रचनाकार क्यों न हो, यदि उसके भीतर विनम्रता और मानवीय संवेदना नहीं है, तो उसकी महानता अधूरी रह जाती है। यही सबसे बड़ा जीवन-मूल्य है जो मैंने अपने वरिष्ठ साहित्यकारों से सीखा।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: आपके अनुसार एक संस्मरण को केवल यादों का दस्तावेज़ बनने से बचाकर एक जीवंत साहित्यिक रचना बनाने के लिए किन तत्वों की आवश्यकता होती है?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>मैं इस तरह के प्रश्नों से थोड़ा असहज हो जाता हूँ, क्योंकि साहित्य को किसी फ़ॉर्मूले में नहीं बाँधा जा सकता। अक्सर लोग पूछते हैं कि किसी अच्छी रचना के लिए कौन-कौन से तत्व होने चाहिए, मानो यह कोई नुस्ख़ा हो—जैसे किसी व्यंजन में कौन-कौन सी चीज़ें डालनी हैं। लेकिन साहित्य इस तरह नहीं बनता।&nbsp;</p><p>यह कहना संभव नहीं है कि अमुक तत्व जोड़ देने से संस्मरण बन जाएगा, या कुछ विशेष गुणों को मिला देने से कोई रचना जीवंत हो जाएगी। साहित्य न तो गणित है और न विज्ञान, जहाँ निश्चित नियमों के आधार पर परिणाम तय किए जा सकें। वह मनुष्य की संवेदना, अनुभव और अनुभूति से जन्म लेता है। संस्मरण भी तभी सार्थक बनता है, जब लेखक उन स्मृतियों को भीतर से जीता है। उसमें केवल घटनाओं का विवरण नहीं होता, बल्कि उन घटनाओं से जुड़ी संवेदनाएँ, रिश्ते, अनुभव और मनुष्य की उपस्थिति भी होती है।&nbsp;</p><p>यदि लेखक की अनुभूति सच्ची है, तो संस्मरण अपने आप जीवंत हो उठता है। आख़िरकार साहित्य का संबंध संवेदना से है, और संवेदना ऐसी चीज़ है जिसे किसी तय परिभाषा या सूत्र में बाँधा नहीं जा सकता। इसलिए मैं नहीं मानता कि किसी संस्मरण को जीवंत बनाने के लिए कुछ निश्चित तत्वों की सूची बनाई जा सकती है। यह लेखक की अनुभूति और उसकी अभिव्यक्ति की ईमानदारी पर निर्भर करता है।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: आज के समय में जब व्यक्तिगत अनुभवों और आत्मकथात्मक लेखन की ओर पाठकों का झुकाव बढ़ रहा है, आपको क्या लगता है कि संस्मरण पाठकों से इतना गहरा जुड़ाव क्यों स्थापित करते हैं?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>किस पाठक का किस तरह का जुड़ाव बनता है, यह ठीक-ठीक कहना कठिन है। लेकिन इतना जरूर है कि मनुष्य की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है—वह दूसरे मनुष्यों के जीवन के बारे में जानना चाहता है। उसे यह उत्सुकता रहती है कि किसी व्यक्ति ने अपना जीवन कैसे जिया, किन परिस्थितियों का सामना किया और उसके अनुभव क्या रहे।&nbsp;</p><p>हालाँकि आत्मकथा या संस्मरण पढ़ते समय यह भी याद रखना चाहिए कि हर लेखक अपने जीवन की पूरी कहानी नहीं लिखता। कुछ बातें छूट जाती हैं, कुछ छिपा ली जाती हैं और कई बार कुछ बातों को लेखक अपने ढंग से प्रस्तुत करता है। इसलिए आत्मकथा को भी अंतिम सत्य मान लेना ठीक नहीं है।&nbsp;</p><p>मुझे लगता है कि आज आत्मकथात्मक लेखन की लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि जो जीवनानुभव, संघर्ष और वास्तविक मनुष्य की उपस्थिति पहले पाठकों को कहानियों और उपन्यासों में मिलती थी, उसकी तलाश अब वे आत्मकथाओं और संस्मरणों में कर रहे हैं। इसलिए इस तरह के लेखन का दायरा लगातार बढ़ा है।&nbsp;</p><p>मेरे अपने उपन्यास समर शेष है और ज़हरबाद में आत्मकथात्मक तत्व रहे हैं। समर शेष है के पाठक अक्सर मुझसे पूछते हैं कि उसमें कितना यथार्थ है और कितनी कल्पना। मैं उनसे कहता हूँ कि कल्पना का अंश बहुत कम है, लेकिन रचना को रचना बनाने के लिए कुछ कलात्मक संयोजन ज़रूरी होता है। केवल घटनाओं को जस का तस लिख देने से साहित्य नहीं बनता। फिर भी, जो मूल अनुभव और संघर्ष हैं, वे वास्तविक जीवन से ही आते हैं। शायद यही कारण है कि पाठक ऐसे लेखन से जुड़ जाते हैं। उन्हें उसमें अपने जीवन की झलक दिखाई देती है। वे पात्रों और अनुभवों के साथ एकाकार हो जाते हैं, उनकी पीड़ा, संघर्ष और भावनाओं को महसूस करते हैं। कई पाठकों ने मुझसे कहा कि समर शेष है पढ़ते हुए वे रो पड़े या उन्हें लगा कि वे स्वयं उस यात्रा का हिस्सा हैं। लेखक के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है?&nbsp;</p><p>विश्व साहित्य और भारतीय साहित्य दोनों में आत्मकथात्मक लेखन की एक समृद्ध परंपरा रही है। चाहे गोर्की की आत्मकथा हों या हरिवंशराय बच्चन की बहुखंडी आत्मकथा, पाठकों ने उन्हें इसलिए अपनाया क्योंकि उनमें जीवन अपनी पूरी जटिलता और संघर्ष के साथ उपस्थित है। मुझे लगता है कि जब लेखक ईमानदारी से अपने अनुभव और संघर्ष पाठकों के सामने रखता है, तो पाठक उससे स्वाभाविक रूप से जुड़ाव महसूस करते हैं।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: आपकी किताब में साहित्यकारों के साथ-साथ एक पूरे साहित्यिक दौर की झलक भी दिखाई देती है। उस दौर और आज के साहित्यिक परिवेश में आप सबसे बड़ा अंतर क्या देखते हैं?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>मुझे लगता है कि उस दौर और आज के साहित्यिक परिवेश के बीच सबसे बड़ा अंतर लेखकों के आपसी मेल-जोल और संबंधों में आया है। जिस समय के साहित्यकारों को मैंने इस किताब में याद किया है, उस समय लेखक केवल एक-दूसरे को पढ़ते ही नहीं थे, बल्कि एक-दूसरे के जीवन का हिस्सा भी होते थे। उनके बीच नियमित&nbsp;</p><p>मुलाकातें होती थीं, घरों में आना-जाना होता था और कई बार पारिवारिक संबंध तक बन जाते थे। आज स्थिति काफी बदल गई है। लेखक ही नहीं, सामान्य लोगों के बीच भी पहले जैसा मिलना-जुलना कम हो गया है। लोग मिलते हैं, नमस्ते-सलाम करते हैं, ज़रूरत पड़ने पर फोन पर बात कर लेते हैं, लेकिन वह आत्मीयता और निकटता पहले जैसी नहीं रह गई। मुझे लगता है कि इसमें तकनीक की भी बड़ी भूमिका है। मोबाइल और संचार के आधुनिक साधनों ने संपर्क तो आसान किया है, लेकिन प्रत्यक्ष मुलाकातों की संस्कृति को कम कर दिया है।&nbsp;</p><p>एक समय था जब चिट्ठियाँ लिखी जाती थीं। उन पत्रों में केवल सूचनाएँ नहीं होती थीं, जीवन के अनुभव, रिश्तों की गर्माहट और समय की धड़कन भी दर्ज होती थी। कई पत्र तो साहित्यिक दस्तावेज़ बन गए। आज वह परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है।&nbsp;</p><p>इसी तरह साहित्यिक अड्डों की संस्कृति भी बहुत कम हो गई है। दिल्ली, इलाहाबाद और दूसरे शहरों में ऐसी अनेक जगहें हुआ करती थी जहाँ लेखक नियमित रूप से मिलते, घंटों बातचीत करते, साहित्य पर बहस करते और एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करते थे। उन बैठकों में केवल साहित्यिक चर्चा नहीं होती थी, बल्कि मानवीय संबंध भी बनते थे। आज ऐसे अवसर बहुत कम दिखाई देते हैं।&nbsp;</p><p>शायद यही कारण है कि मेरी किताब में अधिकतर संस्मरण वरिष्ठ साहित्यकारों पर हैं। संस्मरण केवल किसी व्यक्ति के बारे में जानकारी भर नहीं होता, वह गहरे मानवीय संबंधों और साझा अनुभवों से बनता है। जब लोगों के बीच मेल-जोल कम होगा, तो वैसी स्मृतियाँ भी कम बनेंगी जो आगे चलकर संस्मरण का रूप ले सकें।&nbsp;</p><p>इसलिए मुझे लगता है कि सबसे बड़ा अंतर यही है कि पहले साहित्यिक संसार में आत्मीयता, संवाद और पारस्परिक संबंध अधिक थे। आज संपर्क तो बहुत हैं, लेकिन संबंध अपेक्षाकृत कम गहरे रह गए हैं। यही बदलाव साहित्यिक परिवेश में सबसे स्पष्ट दिखाई देता है।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: यदि ‘स्मृतियों की बस्ती’ पढ़ने के बाद पाठक अपने जीवन और अपनी स्मृतियों को नए दृष्टिकोण से देखना शुरू करें, तो आप चाहते हैं कि वे कौन-सा संदेश अपने साथ लेकर जाएँ?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>मैं स्वयं को ऐसा व्यक्ति नहीं मानता जो पाठकों को कोई संदेश देने बैठा हो। न मैं कोई महात्मा हूँ और न कोई उपदेशक। मेरा मानना है कि किसी भी किताब का अर्थ और उसका संदेश अंततः पाठक ही तय करता है। वह अपने अनुभवों, संवेदनाओं और समझ के आधार पर किसी रचना को ग्रहण करता है, और उसी प्रक्रिया में उसके लिए उसका संदेश भी निर्मित होता है।&nbsp;</p><p>स्मृतियों की बस्ती पढ़ने के बाद कोई पाठक क्या ग्रहण करेगा, यह मैं तय नहीं कर सकता। किताब में जो अनुभव, संबंध और स्मृतियाँ दर्ज हैं, उनमें से जो बात उसके मन को छुएगी, वही उसके लिए संदेश का रूप ले लेगी।&nbsp;</p><p>हाँ, इतना जरूर कहूँगा कि आज की नई पीढ़ी को अपने ढंग से सोचना चाहिए, सकारात्मक बने रहना चाहिए और धैर्य रखना चाहिए। विशेष रूप से रचनाकारों के लिए धैर्य बहुत ज़रूरी है। आज के समय में जल्दी परिणाम पाने की जो छटपटाहट दिखाई देती है, वह रचनात्मकता के लिए बहुत अनुकूल नहीं है। अच्छा लेखन समय, अनुभव और धैर्य माँगता है।&nbsp;</p><p>बाकी, मैं किसी एक संदेश पर जोर नहीं देना चाहता। पाठक किताब पढ़कर जो महसूस करे, जो विचार उसके भीतर जन्म लें और जो बात उसे सबसे अधिक प्रभावित करे, वही उसके लिए इस किताब का वास्तविक संदेश होगा।</p> ]]>
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        <pubDate>Sat, 07 25, 2026 10:00 am</pubDate>
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                <![CDATA[ <p><strong>फ्रंटलिस्ट: ‘स्मृतियों की बस्ती’ लिखते समय जब आप अपने अतीत और साहित्यिक यात्राओं को फिर से जी रहे थे, तब आपने अपने भीतर कौन-सी नई खोज की?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>यह पूरी किताब एक साथ नहीं लिखी गई। इसमें शामिल संस्मरण अलग-अलग समय पर लिखे गए हैं और जिन साहित्यकारों पर मैंने लिखा है, उनसे मेरी सिर्फ़ मुलाकातें ही नहीं थीं, बल्कि गहरा आत्मीय संबंध भी था।&nbsp;</p><p>जब भी मैं किसी लेखक पर संस्मरण लिखने बैठता था, तो उन बीते हुए क्षणों को फिर से जीना पड़ता था। उदाहरण के लिए, जब मैंने हजारीप्रसाद द्विवेदी पर संस्मरण लिखा, तो मुझे ऐसा महसूस हुआ मानो मैं फिर से उनके घर, उनके कमरे में बैठा हूँ और हम आमने-सामने बातचीत कर रहे हैं। स्मृतियाँ मुझे उसी समय और उसी वातावरण में ले जाती थीं।&nbsp;</p><p>इसी तरह, जब मैं अमृतलाल नागर के बारे में लिख रहा था, तो ऐसा लगा जैसे मैं दिल्ली में नहीं, बल्कि लखनऊ में उनके घर बैठा हूँ। संस्मरण लिखने का अर्थ ही है स्मृतियों के भीतर उतर जाना। उस समय लेखक अपने वर्तमान में नहीं रहता, बल्कि अपने मन और अनुभूति के साथ उस बीते हुए समय और स्थान में पहुँच जाता है।&nbsp;</p><p>मेरा मानना है कि यदि ऐसा न हो, तो संस्मरण बेजान हो जाएंगे। उनमें न आत्मीयता बचेगी, न जीवंतता और न ही वह आनंद, जो स्मृतियों को शब्द देने से पैदा होता है। संस्मरण तभी सजीव बनते हैं, जब लेखक का मन उन क्षणों में लौट जाए और वह उन्हें भीतर से फिर एक बार जी ले। ‘स्मृतियों की बस्ती’ लिखते हुए मेरे साथ भी यही हुआ।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: इस किताब में आपने अनेक महान साहित्यकारों को बहुत मानवीय रूप में प्रस्तुत किया है। उनके व्यक्तित्व का कौन-सा पक्ष आपको सबसे अधिक प्रभावित करता है और क्यों?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>यह बात तो किताब पढ़ने वाले पाठकों को स्वयं समझ में आएगी। इन संस्मरणों में मैंने जिन साहित्यकारों को याद किया है, उनके व्यक्तित्व के जो पक्ष मुझे प्रभावित करते रहे, वे उन्हीं संस्मरणों में निहित हैं। मेरे अलग से बताने से उसमें कुछ जुड़ नहीं जाएगा।&nbsp;</p><p>फिर भी, एक बात जो अपने से वरिष्ठ साहित्यकारों में मैंने बार-बार देखी, वह उनकी विनम्रता थी। इस गुण ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसके साथ ही वे केवल लेखक नहीं थे, बल्कि मार्गदर्शक भी थे। उनसे बातचीत के दौरान अक्सर कोई नया दृष्टिकोण, कोई नई राह या सोचने का नया तरीका मिलता था। हर व्यक्ति का अपना अलग व्यक्तित्व होता है और हर मुलाकात का असर भी अलग होता है। कई बार किसी व्यक्ति से लंबे समय तक मिलने-जुलने के बाद उसकी छवि बनती है, लेकिन कभी-कभी एक ही मुलाकात बहुत गहरी अनुभूति दे जाती है। उदाहरण के लिए, हरिवंशराय बच्चन से मेरी केवल एक ही मुलाकात हुई थी, लेकिन&nbsp;</p><p>उसी एक मुलाकात ने मुझे इतना कुछ दिया कि मैं उन पर संस्मरण लिख सका। इसलिए मुझे लगता है कि पाठक जब इन संस्मरणों को पढ़ेंगे, तो वे स्वयं महसूस कर पाएंगे कि किस साहित्यकार के व्यक्तित्व का कौन-सा पक्ष मुझे सबसे अधिक प्रभावित करता रहा।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: स्मृतियाँ अक्सर केवल घटनाएँ नहीं होतीं, वे भावनाओं का भी संग्रह होती हैं। इस किताब को लिखते हुए कोई ऐसी स्मृति रही जिसने आपको भावनात्मक रूप से सबसे अधिक स्पर्श किया हो?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​</strong>किताब में जिन साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण शामिल हैं, उनकी स्मृतियों ने मुझे भावनात्मक रूप से छुआ, तभी तो मैं उन पर लिख पाया। सच तो यह है कि सभी स्मृतियाँ किसी न किसी रूप में भावनात्मक होती हैं। यदि वे भीतर को स्पर्श न करें, तो लेखक के लिए उन पर लिखना संभव ही नहीं है।&nbsp;</p><p>अमरकांत जी पर मैंने दो संस्मरण लिखे हैं। उनसे मेरा लंबे समय तक संपर्क नहीं रह पाया था। जितनी मुलाकातें हुईं, मैं केवल उतना ही लिख सका। फिर एक लंबा अंतराल आ गया और अचानक उनके निधन का समाचार मिला। उस समय मन में बार-बार यही विचार आया कि काश, उनसे एक बार और मिलना हो गया होता। शायद कोई ऐसी बात जानने या समझने को मिल जाती जो अधूरी रह गई। ऐसी अनुभूति केवल अमरकांत जी के साथ नहीं, लगभग हर लेखक के साथ रही है। संस्मरण लिखते समय कई बार यह एहसास होता है कि कुछ और समय साथ बिताने का अवसर मिल जाता, तो शायद स्मृतियों का दायरा और विस्तृत होता।&nbsp;</p><p>हरिशंकर परसाई को याद करते हुए भी ऐसी ही भावनाएँ उभरती हैं। उनसे मेरी केवल एक मुलाकात हुई थी, लेकिन वह आज भी मुझे गहराई से आंदोलित करती है। मेरे उपन्यास ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ के प्रकाशन के बाद जब मेरे विरुद्ध प्रतिकूल परिस्थितियाँ बन गई थीं, तब परसाई जी इस बात से मुझसे भी अधिक व्यथित थे। वे दूर बैठे लोगों को पत्र लिखकर मेरी चिंता व्यक्त कर रहे थे और यह बता रहे थे कि मेरे खिलाफ़ कैसा माहौल बनाया जा रहा है। उस समय हम एक-दूसरे से दूर थे, लेकिन उनकी संवेदना और आत्मीयता लगातार मेरे साथ थी।&nbsp;</p><p>मेरे लिए यही भावनात्मकता सबसे बड़ी बात है—किसी लेखक का केवल साहित्य के माध्यम से नहीं, बल्कि मनुष्य के रूप में भी आपके जीवन से जुड़ जाना। यही वे स्मृतियाँ हैं जो आज भी भीतर तक स्पर्श करती हैं।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: आपने त्रिलोचन, अमृतलाल नागर, अमरकान्त और अन्य साहित्यकारों से जो सीखा, उनमें से कौन-सा जीवन - मूल्य आज भी आपके लेखन और जीवन का आधार बना हुआ है?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>इन साहित्यकारों से मैंने बहुत कुछ सीखा है। यह कहना कठिन है कि उनमें से कौन-सी एक बात मेरे लेखन या जीवन का आधार बन गई, क्योंकि हर व्यक्ति ने अपने ढंग से मुझे प्रभावित किया। फिर भी, कुछ मूल्य ऐसे हैं जो आज भी मेरे साथ बने हुए हैं।&nbsp;</p><p>सबसे अधिक निकटता मेरी अमरकांत जी से रही। विद्यार्थी जीवन में उनसे मेरी पहली मुलाकात हुई थी और बाद में उनसे गहरा आत्मीय संबंध बन गया। उम्र में वे मुझसे काफी बड़े थे, इसलिए उसे मित्रता कहना ठीक नहीं होगा, लेकिन जीवन के कठिन दिनों में उन्होंने जिस तरह मेरा साथ दिया, वह मैं कभी नहीं भूल सकता। जब मैं बेरोज़गार था और मेरे पास कोई काम नहीं था, तब उन्होंने अपने दफ्तर में मेरे लिए काम की व्यवस्था की। लगभग छह महीने तक मैंने उनके साथ बैठकर संपादन का कार्य किया। उनसे मैंने यह सीखा कि दूसरों की पीड़ा को केवल देखना ही नहीं, बल्कि उसके प्रति संवेदनशील होना और यथासंभव सहायता के लिए आगे आना भी ज़रूरी है। बहुत लोग किसी को दुखी देखकर सहानुभूति तो व्यक्त कर देते हैं, लेकिन सहायता के लिए ठोस प्रयास नहीं करते। अमरकांत जी ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने मेरे लिए रास्ता खोजा और मदद की।&nbsp;</p><p>दूसरी बात, जो लगभग सभी वरिष्ठ साहित्यकारों में मैंने देखी, वह उनकी विनम्रता थी। हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे महान विद्वान से पहली बार मिलने जाते हुए मुझे संकोच था कि पता नहीं वे मिलेंगे भी या नहीं। उस समय मेरी कोई विशेष पहचान भी नहीं थी। लेकिन जब उनसे मिला, तो उन्होंने औपचारिकता नहीं दिखाई, बल्कि इतने आत्मीय भाव से मिले कि मैं अभिभूत हो गया। उनकी सहजता और अपनापन आज भी याद है।&nbsp;</p><p>हरिवंशराय बच्चन के साथ भी ऐसा ही अनुभव रहा। पहली बार उनसे मिलने में कई तरह की बाधाएँ आईं, लेकिन जब मुलाकात हुई तो उन्होंने जिस आत्मीयता और विनम्रता से व्यवहार किया, वह मेरे मन में हमेशा के लिए बस गया। इतने बड़े साहित्यकार होने के बावजूद उनमें किसी प्रकार का दंभ नहीं था।&nbsp;</p><p>इन सभी अनुभवों ने मुझे यह सिखाया कि व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, उसे अहंकार से दूर रहना चाहिए। विनम्रता और अच्छा व्यवहार ही मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान हैं। मैं आज भी जब कोई नया लेखक, विद्यार्थी या पाठक मुझसे मिलने या बात करने की इच्छा व्यक्त करता है, तो उसे समय देने की कोशिश करता हूँ। इसका कारण यही है कि मैं स्वयं भी कभी उसी स्थिति में था। संघर्ष के वे दिन मैंने देखे हैं, जब रचनाएँ लौट आती थीं और पहचान बनाने के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ता था।&nbsp;</p><p>मुझे लगता है कि लेखक की महानता केवल उसके लेखन में नहीं, बल्कि उसके व्यवहार में भी दिखाई देती है। कोई व्यक्ति कितना भी बड़ा रचनाकार क्यों न हो, यदि उसके भीतर विनम्रता और मानवीय संवेदना नहीं है, तो उसकी महानता अधूरी रह जाती है। यही सबसे बड़ा जीवन-मूल्य है जो मैंने अपने वरिष्ठ साहित्यकारों से सीखा।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: आपके अनुसार एक संस्मरण को केवल यादों का दस्तावेज़ बनने से बचाकर एक जीवंत साहित्यिक रचना बनाने के लिए किन तत्वों की आवश्यकता होती है?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>मैं इस तरह के प्रश्नों से थोड़ा असहज हो जाता हूँ, क्योंकि साहित्य को किसी फ़ॉर्मूले में नहीं बाँधा जा सकता। अक्सर लोग पूछते हैं कि किसी अच्छी रचना के लिए कौन-कौन से तत्व होने चाहिए, मानो यह कोई नुस्ख़ा हो—जैसे किसी व्यंजन में कौन-कौन सी चीज़ें डालनी हैं। लेकिन साहित्य इस तरह नहीं बनता।&nbsp;</p><p>यह कहना संभव नहीं है कि अमुक तत्व जोड़ देने से संस्मरण बन जाएगा, या कुछ विशेष गुणों को मिला देने से कोई रचना जीवंत हो जाएगी। साहित्य न तो गणित है और न विज्ञान, जहाँ निश्चित नियमों के आधार पर परिणाम तय किए जा सकें। वह मनुष्य की संवेदना, अनुभव और अनुभूति से जन्म लेता है। संस्मरण भी तभी सार्थक बनता है, जब लेखक उन स्मृतियों को भीतर से जीता है। उसमें केवल घटनाओं का विवरण नहीं होता, बल्कि उन घटनाओं से जुड़ी संवेदनाएँ, रिश्ते, अनुभव और मनुष्य की उपस्थिति भी होती है।&nbsp;</p><p>यदि लेखक की अनुभूति सच्ची है, तो संस्मरण अपने आप जीवंत हो उठता है। आख़िरकार साहित्य का संबंध संवेदना से है, और संवेदना ऐसी चीज़ है जिसे किसी तय परिभाषा या सूत्र में बाँधा नहीं जा सकता। इसलिए मैं नहीं मानता कि किसी संस्मरण को जीवंत बनाने के लिए कुछ निश्चित तत्वों की सूची बनाई जा सकती है। यह लेखक की अनुभूति और उसकी अभिव्यक्ति की ईमानदारी पर निर्भर करता है।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: आज के समय में जब व्यक्तिगत अनुभवों और आत्मकथात्मक लेखन की ओर पाठकों का झुकाव बढ़ रहा है, आपको क्या लगता है कि संस्मरण पाठकों से इतना गहरा जुड़ाव क्यों स्थापित करते हैं?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>किस पाठक का किस तरह का जुड़ाव बनता है, यह ठीक-ठीक कहना कठिन है। लेकिन इतना जरूर है कि मनुष्य की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है—वह दूसरे मनुष्यों के जीवन के बारे में जानना चाहता है। उसे यह उत्सुकता रहती है कि किसी व्यक्ति ने अपना जीवन कैसे जिया, किन परिस्थितियों का सामना किया और उसके अनुभव क्या रहे।&nbsp;</p><p>हालाँकि आत्मकथा या संस्मरण पढ़ते समय यह भी याद रखना चाहिए कि हर लेखक अपने जीवन की पूरी कहानी नहीं लिखता। कुछ बातें छूट जाती हैं, कुछ छिपा ली जाती हैं और कई बार कुछ बातों को लेखक अपने ढंग से प्रस्तुत करता है। इसलिए आत्मकथा को भी अंतिम सत्य मान लेना ठीक नहीं है।&nbsp;</p><p>मुझे लगता है कि आज आत्मकथात्मक लेखन की लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि जो जीवनानुभव, संघर्ष और वास्तविक मनुष्य की उपस्थिति पहले पाठकों को कहानियों और उपन्यासों में मिलती थी, उसकी तलाश अब वे आत्मकथाओं और संस्मरणों में कर रहे हैं। इसलिए इस तरह के लेखन का दायरा लगातार बढ़ा है।&nbsp;</p><p>मेरे अपने उपन्यास समर शेष है और ज़हरबाद में आत्मकथात्मक तत्व रहे हैं। समर शेष है के पाठक अक्सर मुझसे पूछते हैं कि उसमें कितना यथार्थ है और कितनी कल्पना। मैं उनसे कहता हूँ कि कल्पना का अंश बहुत कम है, लेकिन रचना को रचना बनाने के लिए कुछ कलात्मक संयोजन ज़रूरी होता है। केवल घटनाओं को जस का तस लिख देने से साहित्य नहीं बनता। फिर भी, जो मूल अनुभव और संघर्ष हैं, वे वास्तविक जीवन से ही आते हैं। शायद यही कारण है कि पाठक ऐसे लेखन से जुड़ जाते हैं। उन्हें उसमें अपने जीवन की झलक दिखाई देती है। वे पात्रों और अनुभवों के साथ एकाकार हो जाते हैं, उनकी पीड़ा, संघर्ष और भावनाओं को महसूस करते हैं। कई पाठकों ने मुझसे कहा कि समर शेष है पढ़ते हुए वे रो पड़े या उन्हें लगा कि वे स्वयं उस यात्रा का हिस्सा हैं। लेखक के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है?&nbsp;</p><p>विश्व साहित्य और भारतीय साहित्य दोनों में आत्मकथात्मक लेखन की एक समृद्ध परंपरा रही है। चाहे गोर्की की आत्मकथा हों या हरिवंशराय बच्चन की बहुखंडी आत्मकथा, पाठकों ने उन्हें इसलिए अपनाया क्योंकि उनमें जीवन अपनी पूरी जटिलता और संघर्ष के साथ उपस्थित है। मुझे लगता है कि जब लेखक ईमानदारी से अपने अनुभव और संघर्ष पाठकों के सामने रखता है, तो पाठक उससे स्वाभाविक रूप से जुड़ाव महसूस करते हैं।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: आपकी किताब में साहित्यकारों के साथ-साथ एक पूरे साहित्यिक दौर की झलक भी दिखाई देती है। उस दौर और आज के साहित्यिक परिवेश में आप सबसे बड़ा अंतर क्या देखते हैं?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>मुझे लगता है कि उस दौर और आज के साहित्यिक परिवेश के बीच सबसे बड़ा अंतर लेखकों के आपसी मेल-जोल और संबंधों में आया है। जिस समय के साहित्यकारों को मैंने इस किताब में याद किया है, उस समय लेखक केवल एक-दूसरे को पढ़ते ही नहीं थे, बल्कि एक-दूसरे के जीवन का हिस्सा भी होते थे। उनके बीच नियमित&nbsp;</p><p>मुलाकातें होती थीं, घरों में आना-जाना होता था और कई बार पारिवारिक संबंध तक बन जाते थे। आज स्थिति काफी बदल गई है। लेखक ही नहीं, सामान्य लोगों के बीच भी पहले जैसा मिलना-जुलना कम हो गया है। लोग मिलते हैं, नमस्ते-सलाम करते हैं, ज़रूरत पड़ने पर फोन पर बात कर लेते हैं, लेकिन वह आत्मीयता और निकटता पहले जैसी नहीं रह गई। मुझे लगता है कि इसमें तकनीक की भी बड़ी भूमिका है। मोबाइल और संचार के आधुनिक साधनों ने संपर्क तो आसान किया है, लेकिन प्रत्यक्ष मुलाकातों की संस्कृति को कम कर दिया है।&nbsp;</p><p>एक समय था जब चिट्ठियाँ लिखी जाती थीं। उन पत्रों में केवल सूचनाएँ नहीं होती थीं, जीवन के अनुभव, रिश्तों की गर्माहट और समय की धड़कन भी दर्ज होती थी। कई पत्र तो साहित्यिक दस्तावेज़ बन गए। आज वह परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है।&nbsp;</p><p>इसी तरह साहित्यिक अड्डों की संस्कृति भी बहुत कम हो गई है। दिल्ली, इलाहाबाद और दूसरे शहरों में ऐसी अनेक जगहें हुआ करती थी जहाँ लेखक नियमित रूप से मिलते, घंटों बातचीत करते, साहित्य पर बहस करते और एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करते थे। उन बैठकों में केवल साहित्यिक चर्चा नहीं होती थी, बल्कि मानवीय संबंध भी बनते थे। आज ऐसे अवसर बहुत कम दिखाई देते हैं।&nbsp;</p><p>शायद यही कारण है कि मेरी किताब में अधिकतर संस्मरण वरिष्ठ साहित्यकारों पर हैं। संस्मरण केवल किसी व्यक्ति के बारे में जानकारी भर नहीं होता, वह गहरे मानवीय संबंधों और साझा अनुभवों से बनता है। जब लोगों के बीच मेल-जोल कम होगा, तो वैसी स्मृतियाँ भी कम बनेंगी जो आगे चलकर संस्मरण का रूप ले सकें।&nbsp;</p><p>इसलिए मुझे लगता है कि सबसे बड़ा अंतर यही है कि पहले साहित्यिक संसार में आत्मीयता, संवाद और पारस्परिक संबंध अधिक थे। आज संपर्क तो बहुत हैं, लेकिन संबंध अपेक्षाकृत कम गहरे रह गए हैं। यही बदलाव साहित्यिक परिवेश में सबसे स्पष्ट दिखाई देता है।&nbsp;</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: यदि ‘स्मृतियों की बस्ती’ पढ़ने के बाद पाठक अपने जीवन और अपनी स्मृतियों को नए दृष्टिकोण से देखना शुरू करें, तो आप चाहते हैं कि वे कौन-सा संदेश अपने साथ लेकर जाएँ?&nbsp;</strong></p><p><strong>अब्दुल:​&nbsp;</strong>मैं स्वयं को ऐसा व्यक्ति नहीं मानता जो पाठकों को कोई संदेश देने बैठा हो। न मैं कोई महात्मा हूँ और न कोई उपदेशक। मेरा मानना है कि किसी भी किताब का अर्थ और उसका संदेश अंततः पाठक ही तय करता है। वह अपने अनुभवों, संवेदनाओं और समझ के आधार पर किसी रचना को ग्रहण करता है, और उसी प्रक्रिया में उसके लिए उसका संदेश भी निर्मित होता है।&nbsp;</p><p>स्मृतियों की बस्ती पढ़ने के बाद कोई पाठक क्या ग्रहण करेगा, यह मैं तय नहीं कर सकता। किताब में जो अनुभव, संबंध और स्मृतियाँ दर्ज हैं, उनमें से जो बात उसके मन को छुएगी, वही उसके लिए संदेश का रूप ले लेगी।&nbsp;</p><p>हाँ, इतना जरूर कहूँगा कि आज की नई पीढ़ी को अपने ढंग से सोचना चाहिए, सकारात्मक बने रहना चाहिए और धैर्य रखना चाहिए। विशेष रूप से रचनाकारों के लिए धैर्य बहुत ज़रूरी है। आज के समय में जल्दी परिणाम पाने की जो छटपटाहट दिखाई देती है, वह रचनात्मकता के लिए बहुत अनुकूल नहीं है। अच्छा लेखन समय, अनुभव और धैर्य माँगता है।&nbsp;</p><p>बाकी, मैं किसी एक संदेश पर जोर नहीं देना चाहता। पाठक किताब पढ़कर जो महसूस करे, जो विचार उसके भीतर जन्म लें और जो बात उसे सबसे अधिक प्रभावित करे, वही उसके लिए इस किताब का वास्तविक संदेश होगा।</p> ]]>
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            <pubDate>Sat, 07 25, 2026 10:00 am</pubDate>
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