<rss version="2.0">
    <channel>
        <title>
            <![CDATA[ पुस्तक “चाक चुंबन”  के लेखक संतोष सिंह राख़, के साथ साक्षात्कार ]]>
        </title>
        <link>
            <![CDATA[ https://www.frontlist.in/%20https://www.frontlist.in/public/index.php/interview-with-santosh-singh-raakh-author-chaak-chumban ]]>
        </link>
        <description>
            <![CDATA[ <p><strong>फ़्रंटलिस्ट: पुस्तक “चाक चुम्बन ” में समाज और तंत्र की बीमारू व् यवस्था का उल्ले ख है। आपके वचार में साहत्यकस प्र कार ऐसी व् यवस्थाओं पर चोट कर सकता है?</strong></p><p><strong>राख़: </strong>सर्वप्रथम मैं ज़ोरबा टीम के जज्बे को सलाम करना चाहूंगा। जिस प्रकार Zorba ने अपनी मुकम्मल तरबियत की बारीकियों से मेरे कलम के विस्फोट को करीने से संभाला, मैं निःशब्द हूं। रही बात साहित्य के माध्यम से व्यवस्था पर चोट करने की तो जाहिर सी बात है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। चूंकि साहित्य से जुड़े लोग किसी दूसरे ग्रह के प्राणी तो होते नहीं। उनका भी हमारी तरह इसी परिवेश में पल्लवन होता है। फर्क बस इतना भर है कि वे व्यवस्था की तमाम खामियों को बड़ी बारीकी से अवलोकन कर उन्हें शब्द रूप दे पाते हैं। वे कोई जादूगर नहीं होते। समाज में व्याप्त त्रुटियों को एक फूंक मारकर ठीक कर देने वाली उनके पास कोई मंत्र भी नहीं होता। हां, पर इतना जरूर है कि उनके पास ब्रह्मास्त्र से भी ज्यादा मारक क्षमता वाला यंत्र होता है। वह हैं कलम। इतिहास गवाह है इसका। चाहे वह फ्रांस की गौरवमयी क्रांति हो या फिर रसिया की बोल्शेविक क्रांति। अपनी भारत की बात करें और याद करें भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की। किस तरह भारतीय कलम के मार से हताहत थे फिरंगी। बंकिम दा की आनन्द मठ से लेकर प्रेमचंद की सोजे वतन तक। किस तरह कवियों और लेखकों ने कविताओं, उपन्यासों और नाटकों के माध्यम से लोगों को प्रेरित किया। ब्रिटिश शासन की ईंट हिल गई। साहित्य ने क्षेत्रीय और धार्मिक मतभेदों को दरकिनार किया और ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों, आर्थिक शोषण, बेरोजगारी और किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण किया। ऐसे कईयों उदाहरण आपको देखने को मिलेंगे। भारतेंदु की 'भारत दुर्दशा' और गुप्त की 'भारत-भारती' जैसी रचनाओं से स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई जिसने अंग्रेजों के शोषण को उजागर किया।</p><p><strong>फ़्रंटलिस्ट: किताब की रचनाओं में बारूदों की बाहुल्यता और आने वाली नस्ल के लिए अभिमन्यु का प्रारूप प्रस्तुत किया गया है। क्या आप बता सकते हैं कि यह विचार आपको कैसे आया और इसके पीछे आपका व्यक्तिगत दृष्टिकोण क्या है?</strong></p><p><strong>राख़:</strong> मेरा मानना है कि राष्ट्र सर्वोपरि है। राष्ट्र का निर्माण करना किसी महायज्ञ करने से कम नहीं। यह एक ऐसा महासमर है जिसके समिधा स्वरूप हमें सज्ज रहना होगा। और यह तभी संभव हो पाएगा जब देश का हर युवा अभिमन्यु की तरह खुद को तैयार कर सके। इसके लिए किसी एलजेब्रा का लीनियर इक्वेशन को सिद्ध करने जैसी कोई बात नहीं होगी। इसमें माना की या सपोज दैट जैसी थ्योरी की भी उपयोगिता नगण्य होगी। यहां Service before self की बात होगी। मैटेरियलिज्म से निजात पाना होगा। अपनी विरासत और सांस्कृतिक मूल्यों को विचारना होगा। आज की फास्ट फूड रोबोटिक जीवनशैली में हमें आमूलचूल परिवर्तन लाने होंगे। इसके लिए हमें कुछ कसरत करनी होगी। बीजारोपण करना होगा एक नए प्रकार के नस्लों की जिन्हें दूध के बोतलों की बजाए बारूद के कणों से मनोविनोद कराया जा सके। देश की आंतरिक और वैश्विक परिस्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है। चिंतन करना होगा। आज भ्रष्टाचार चरम पर है। युद्ध प्रथम विकल्प है। पलीते में आग लग चुकी है। आज चाणक्य फिर प्रासंगिक हो चूके हैं। इसके लिए हमें खास SOP (Standard operating procedure) का निर्माण करना होगा। जात, मजहब और क्षेत्रवाद से ऊपर उठना होगा। यह मेरा व्यक्तिगत दृष्टिकोण है। देश का हर नागरिक इस कदर अनुशासित और जागरूक हो कि उसे भेड़ और भेड़िया के बीच का अंतर पता चल सके।</p><p>इस किताब की शीर्षक कविता' चाक चुम्बन' या फिर' मगध सो रहा है' या फिर' आss कथू' में इसी बात का जिक्र है। समझना होगा कि संविधान की धाराएं केवल प्रतियोगी परीक्षाओं तक ही सीमित न रह पाए । इसकी प्रस्तावना को हमें दैनिक प्रार्थनाओं में शामिल करना होगा। जंगे आजादी किन मूल्यों पर लड़ी गई और आज हम किन मूल्यों पर विवादग्रस्त हैं, दोनों का तुलनात्मक विश्लेषण करना होगा।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: चाक चुम्बन में व्यक्ति और समाज के बीच के संघर्ष को बड़े गहरे भावों में प्रस्तुत किया गया है। आपके लिए इसे इस तरह से व्यक्त करना व्यक्तिगत रूप से कितना चुनौतीपूर्ण या संतोषजनक रहा?</strong></p><p><strong>राख़: </strong>बिलकुल । इसमें दो राय नहीं है। व्यक्ति से समाज बनता है और समाज से राज्य या देश। दोनोंएक दूसरे के पूरक हैं। यह अतिशयोक्ति नहीं कि व्यक्ति राष्ट्र रूपी वृक्ष का मूल है। वृक्ष का ऐश्वर्य उसके जड़ों पर निर्भर है। और यह तभी संभव है जबतक कि सत्यनिष्ठा से दोनों अपनेअपने कर्तव्यों की कसौटी पर खड़ा उतरे। दिक्कत तब होती हैं जब ओछी लिप्साओं में कैद हो समाज या देश का तथाकथित ठेकेदार चयनात्मक दृष्टिकोण अपना लेता है। परिणामस्वरूप खटास का उपजना लाजमी हो जाता है। व्यक्ति और समाज के बीच के संघर्षों को अलग अलग बिंबों में दर्शाना और भी चुनौतीपूर्ण और तकलीफदेह होता है। समाज परंपरा की दुहाई देता हुआ दीवार बांधता फिरता है। दूसरी तरफ व्यक्ति उनमें सीढ़ियां तलाशता है। दोनों अपनी हठधर्मिता पर कायम है।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: रचना में "आलस्य को पीना छोड़" और "कबंधासुर की तरह जीवन जीना छोड़" जैसे विचार हैं। क्या आप बता सकते हैं कि इन विचारों को सामने लाने के पीछे आपकी प्रेरणा क्या थी?</strong></p><p><strong>राख़: </strong>देखिए। आज के दौर में हम अफवाहों के शिकार हो चुके हैं। AI और फेक न्यूज धड़ल्ले से पीकदान कर रहे हैं। लोगों की जुबान पर' सब चलता है यार' वाला डायलॉग आम हो चुका है। लापरवाही का आलम यह हैं कि हमें यही पता नहीं होता कि बारात कहां खड़ी है। किसी ने भरमाया कि कौआ कान ले गया और हम फौरन कौवे के पीछे भागने लगते हैं। भागने से पहले हम यह जरूरी नहीं समझते कि अपनी कान जांच लें। मानसिक आलस्यता उच्चतम शिखर पर है। राष्ट्रनिर्माण के क्षेत्र में हमारी सहभागिता लगभग गौण है।' मुझे कष्ट चाहिए तथा वंश मोर रोबिनहूड' आदि शीर्षक कविताओं में आप इन सब बातों को तथ्यात्मक रूप से पढ़ पाएंगे। देश में ऐसी अनेको घटनाएं घटी है। अपने नागरिक धर्म का पालन करते हुए अगर हम थोड़े भी चौकन्ने रहते, सजग रहते तो शायद संसद भवन या होटल ताज जैसी इत्यादि दुर्घटनाएं नहीं घटती। KLKD (क्या लेना, क्या देना) की मनः स्थिती ही आज की पीढ़ी की सोच है।। कबंधासुर की तरह जीना छोड़ का तात्पर्य यहाँ यही है कि जिसका सिर न हो, जो विवेकहीन हो। केवल पेट, मुँह और भुजाएँ हो। जिसके लिए दुनिया एक अवसर मात्र हो, केवल भोग और संभोग के लिए।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: चाक चुम्बन का संदेश अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की आपकी सोच क्या रही? आपइसे आज के युवा पाठकों तक कैसे पहुँचाना चाहेंगे?</strong></p><p><strong>राख़: </strong>चाक चुम्बन महज एक काव्य संग्रह नहीं अपितु एक दस्तक है जो युवाओं के नींद में खलल डालना चाहता है। वैसे भी जवानी में नींद बहुत आती है। ऐसेमें युवाओं के लिए यह अलार्म क्लॉक है। चाक चुम्बन का अर्थ है कालचक्र को चूमने की प्रक्रिया। The process of kissing the time wheel. हम जन्म लेते हैं और अपने हिस्से की भागीदारी निभाकर यहां से विदा होते हैं। चाक चुम्बन का प्रश्न युवाओं से है। क्या हमारा काम केवल टूर और ट्रेवलिंग का है या फिर इस धरती पर जन्म लेने का हमारा कुछ उद्देश्य भी है? क्या हमने ठीक-ठाक अपनी जिम्मेवारियों का वहन किया? क्या हमने आजाद, भगत, बिस्मिल की कुर्बानियों के साथ न्याय किया? क्या पिज्जा या बर्गर का लुत्फ उठाते हुए हम सबों को गोलियों की आवाज सुनाई पड़ीं? क्या फेसबुक इंस्टाग्राम सर्किंग करते वक्त उन तोपों की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ी, जिनके point blank की दूरी से हजारों हिंदुस्तानियों के चीथड़े उड़ाए गए, उन भीषण चीत्कारों का कुछ खयाल आया? क्या हमारा दायित्व नहीं कि राष्ट्र निर्माण में हम अपने हिस्से की कम से कम एक ईंट लगाएं? क्या भ्रष्टाचारियों, मुनाफाखोरों तथा बाहरी ताकतों से देश की अस्मिता बचाएं रखने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं? आज का युवा बहुत संवेदनशील और उद्यमी है। पूरी उम्मीद है कि उपरोक्त प्रश्नो को नजरअंदाज आज के बिस्मिल नहीं करेंगे और कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहेंगे।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: हिंदी दिवस के अवसर पर आप क्या संदेश देना चाहेंगे कि हिंदी भाषा के माध्यम से समाज में जागरूकता और सामाजिक चेतना कैसे जगाई जा सकती है?</strong></p><p><strong>राख़: </strong>पूरा देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। परन्तु जिस भाषा में यह चर्चा-ए-आम है, वह अपनी मर्सिया गा रही है। अफसोस की दाल में शर्म का छौंका। हिंदी को उत्तर और दक्षिण के चश्मे से देखना फिजूल है। अंग्रेजी और मंदारिन चीनी के बाद हिंदी विश्व की तीसरी सबसे ज्यादा बोले जानेवाली भाषा है। बावजूद वह जमीन तलाश रही है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में इसने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। आंदोलनकारियों ने तब इसे संचार संवाद का उच्चतम स्रोत माना था।हिंदी किसी एक खास दिवस की मोहताज भी नहीं और न हीं वह किसी पुष्पगुच्छ की अभिलाषी है। वह तो राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने की जिजीविषा रखती है। कमाल की बात है कि भारत के पास अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं। महात्मा गांधी के शब्दों में, "जिस देश की अपनी राष्ट्र भाषा नहीं, वह देश गूंगा है।" तो क्या हम मान लें कि स्वयं को विश्वगुरु बताने वाला देश जिह्वाविहीन है। कतई नहीं।' भय बिन होत न प्रीति' का फॉर्मूला लागू करना होगा। संसद में ठोस विधेयक पारित कर एक मजबूत कानून बनाना होगा। क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर स्कूलों में इसे अनिवार्य करना होगा। मास मीडिया का सारा विज्ञापन हिंदी में हो। हिंदी की प्रचार प्रसार हेतु जिले स्तर पर ही नहीं वरन् गांव स्तर पर भी चौपालों, कवि सम्मेलनों एवम् गोष्ठियों का आयोजन करना होगा ।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: किताब में व्यक्त क्रांतिकारी और विद्रोही भावनाओं को लिखते समय आपके व्यक्तिगत अनुभव और सामाजिक अवलोकन का क्या योगदान रहा?</strong></p><p><strong>राख़: </strong>मेरी प्रिय लेखिका, बाबुषा कोहली जी के शब्दों में कहें तो आप कविता को नहीं लिखते, कविता आपको लिखती है। जो अंदर है वहीं बाहर बहेगा। अपने अनुकूल अणुओं को आकर्षित कर एक नई संरचना को जन्म देगा। तवा गर्म होने पर ही रोटी सेकी जा सकती है। तात्पर्य है कि आपका क्राफ्ट बेलन स्वरूप है जो शब्दों के माध्यम से कविता रूपी रोटी को आकार देता है, सामाजिक अवलोकन आटे का लोई और गर्म तवा व्यक्तिगत अनुभव की आंच। लेखनी में आपकी स्कूलिंग से लेकर आपके आसपास के परिवेश तक का बहुत बड़ा योगदान होता है। इन्हीं सबों के तानेबाने से कविता या कहानी उपजती है। निःसंदेह, मेरी कविता से आक्रामकता एवम् खीझ की गंध आती है। मैं खुद को एक हार्ड-कोर भारतीय मानता हूं और नो कॉम्प्रोमाइज की नीति पर चलता हूं, शायद इसलिए भी। देश सर्वोपरी है। जात धर्म पार्टी संप्रदाय से ऊपर। इसमें किन्तु परंतु की गुंजाइश शून्य है। शायद मेरा फ़ौजी होना भी एक कारण रहा हो। जब पाठकगण' चाक चुम्बन' किताब की यात्रा पर निकलेंगे तो उन्हें मार्ग में ऐसे कई पड़ाव मिलेंगे जहां खून ओर पसीने का कारोबार चलता हुआ दिखेगा। समाज का हर तबका चाहे राशन की लाइन, वोटरोंको वाइन, खेतिहर हताश, मजदूर का विषाद, विद्यार्थियों की मांग, सैनिक की आपबीती, मंदिर-मस्जिद प्रसंग, मीडिया का दायित्व तथा कहीं कहीं प्रतीक्षारत प्रेमिकाएं भी।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: आपके अनुसार, साहित्य में आलोचना और सामाजिक संदेश देने की ताकत कितनी महत्वपूर्ण है, और चाक चुम्बन में आपने इसे कैसे साकार किया?</strong></p><p><strong>राख़:</strong> कबीर की बड़ी ही खूबसूरत उक्ति है, "निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाए, बिन साबुन पानी बिना निर्मल कहां सुहाए।" आलोचना साहित्य की रीढ़ है। रचना की कमियों को उजागर करना, उसकी वाचालता, उसकी व्याकरण बोध को शश्चिता प्रदान करना, उसका ध्येय है। ठीक इसी प्रकार एक साहित्यकर्मी की भी जिम्मेदारी बनती है कि देश और समाज में व्याप्त विसंगतियों को अपनी लेखनी से उजागर करे। पुरस्कार और पदलोलुपता को दरकिनार कर मुद्दों की बात करे। मेरी किताब' चाक चुम्बन ' में ऐसी कविताओं की बाहुल्यता है जो एक देश के नागरिक को उसकी वोट की अहमियता समझता है, लाल बत्ती वीआईपी संस्कृति से आंख मिलकर प्रश्न पूछने का आत्मबल प्रदान करता है। मज़दूरों, किसानों और विद्यार्थियों के मुख से उनकी माली हालात बयानी का मौका देता है। इसलिए तो इस चर्चा के दौरान मैने बताया था कि चाक चुम्बन एक अलार्म क्लॉक है।</p> ]]>
        </description>
        <language>en</language>
        <pubDate>Mon, 09 15, 2025 10:27 am</pubDate>
        <item>
            <title>
                <![CDATA[ पुस्तक “चाक चुंबन”  के लेखक संतोष सिंह राख़, के साथ साक्षात्कार ]]>
            </title>
            <link><![CDATA[ https://www.frontlist.in/%20https://www.frontlist.in/public/index.php/interview-with-santosh-singh-raakh-author-chaak-chumban ]]></link>
            <description>
                <![CDATA[ <p><strong>फ़्रंटलिस्ट: पुस्तक “चाक चुम्बन ” में समाज और तंत्र की बीमारू व् यवस्था का उल्ले ख है। आपके वचार में साहत्यकस प्र कार ऐसी व् यवस्थाओं पर चोट कर सकता है?</strong></p><p><strong>राख़: </strong>सर्वप्रथम मैं ज़ोरबा टीम के जज्बे को सलाम करना चाहूंगा। जिस प्रकार Zorba ने अपनी मुकम्मल तरबियत की बारीकियों से मेरे कलम के विस्फोट को करीने से संभाला, मैं निःशब्द हूं। रही बात साहित्य के माध्यम से व्यवस्था पर चोट करने की तो जाहिर सी बात है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। चूंकि साहित्य से जुड़े लोग किसी दूसरे ग्रह के प्राणी तो होते नहीं। उनका भी हमारी तरह इसी परिवेश में पल्लवन होता है। फर्क बस इतना भर है कि वे व्यवस्था की तमाम खामियों को बड़ी बारीकी से अवलोकन कर उन्हें शब्द रूप दे पाते हैं। वे कोई जादूगर नहीं होते। समाज में व्याप्त त्रुटियों को एक फूंक मारकर ठीक कर देने वाली उनके पास कोई मंत्र भी नहीं होता। हां, पर इतना जरूर है कि उनके पास ब्रह्मास्त्र से भी ज्यादा मारक क्षमता वाला यंत्र होता है। वह हैं कलम। इतिहास गवाह है इसका। चाहे वह फ्रांस की गौरवमयी क्रांति हो या फिर रसिया की बोल्शेविक क्रांति। अपनी भारत की बात करें और याद करें भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की। किस तरह भारतीय कलम के मार से हताहत थे फिरंगी। बंकिम दा की आनन्द मठ से लेकर प्रेमचंद की सोजे वतन तक। किस तरह कवियों और लेखकों ने कविताओं, उपन्यासों और नाटकों के माध्यम से लोगों को प्रेरित किया। ब्रिटिश शासन की ईंट हिल गई। साहित्य ने क्षेत्रीय और धार्मिक मतभेदों को दरकिनार किया और ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों, आर्थिक शोषण, बेरोजगारी और किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण किया। ऐसे कईयों उदाहरण आपको देखने को मिलेंगे। भारतेंदु की 'भारत दुर्दशा' और गुप्त की 'भारत-भारती' जैसी रचनाओं से स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई जिसने अंग्रेजों के शोषण को उजागर किया।</p><p><strong>फ़्रंटलिस्ट: किताब की रचनाओं में बारूदों की बाहुल्यता और आने वाली नस्ल के लिए अभिमन्यु का प्रारूप प्रस्तुत किया गया है। क्या आप बता सकते हैं कि यह विचार आपको कैसे आया और इसके पीछे आपका व्यक्तिगत दृष्टिकोण क्या है?</strong></p><p><strong>राख़:</strong> मेरा मानना है कि राष्ट्र सर्वोपरि है। राष्ट्र का निर्माण करना किसी महायज्ञ करने से कम नहीं। यह एक ऐसा महासमर है जिसके समिधा स्वरूप हमें सज्ज रहना होगा। और यह तभी संभव हो पाएगा जब देश का हर युवा अभिमन्यु की तरह खुद को तैयार कर सके। इसके लिए किसी एलजेब्रा का लीनियर इक्वेशन को सिद्ध करने जैसी कोई बात नहीं होगी। इसमें माना की या सपोज दैट जैसी थ्योरी की भी उपयोगिता नगण्य होगी। यहां Service before self की बात होगी। मैटेरियलिज्म से निजात पाना होगा। अपनी विरासत और सांस्कृतिक मूल्यों को विचारना होगा। आज की फास्ट फूड रोबोटिक जीवनशैली में हमें आमूलचूल परिवर्तन लाने होंगे। इसके लिए हमें कुछ कसरत करनी होगी। बीजारोपण करना होगा एक नए प्रकार के नस्लों की जिन्हें दूध के बोतलों की बजाए बारूद के कणों से मनोविनोद कराया जा सके। देश की आंतरिक और वैश्विक परिस्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है। चिंतन करना होगा। आज भ्रष्टाचार चरम पर है। युद्ध प्रथम विकल्प है। पलीते में आग लग चुकी है। आज चाणक्य फिर प्रासंगिक हो चूके हैं। इसके लिए हमें खास SOP (Standard operating procedure) का निर्माण करना होगा। जात, मजहब और क्षेत्रवाद से ऊपर उठना होगा। यह मेरा व्यक्तिगत दृष्टिकोण है। देश का हर नागरिक इस कदर अनुशासित और जागरूक हो कि उसे भेड़ और भेड़िया के बीच का अंतर पता चल सके।</p><p>इस किताब की शीर्षक कविता' चाक चुम्बन' या फिर' मगध सो रहा है' या फिर' आss कथू' में इसी बात का जिक्र है। समझना होगा कि संविधान की धाराएं केवल प्रतियोगी परीक्षाओं तक ही सीमित न रह पाए । इसकी प्रस्तावना को हमें दैनिक प्रार्थनाओं में शामिल करना होगा। जंगे आजादी किन मूल्यों पर लड़ी गई और आज हम किन मूल्यों पर विवादग्रस्त हैं, दोनों का तुलनात्मक विश्लेषण करना होगा।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: चाक चुम्बन में व्यक्ति और समाज के बीच के संघर्ष को बड़े गहरे भावों में प्रस्तुत किया गया है। आपके लिए इसे इस तरह से व्यक्त करना व्यक्तिगत रूप से कितना चुनौतीपूर्ण या संतोषजनक रहा?</strong></p><p><strong>राख़: </strong>बिलकुल । इसमें दो राय नहीं है। व्यक्ति से समाज बनता है और समाज से राज्य या देश। दोनोंएक दूसरे के पूरक हैं। यह अतिशयोक्ति नहीं कि व्यक्ति राष्ट्र रूपी वृक्ष का मूल है। वृक्ष का ऐश्वर्य उसके जड़ों पर निर्भर है। और यह तभी संभव है जबतक कि सत्यनिष्ठा से दोनों अपनेअपने कर्तव्यों की कसौटी पर खड़ा उतरे। दिक्कत तब होती हैं जब ओछी लिप्साओं में कैद हो समाज या देश का तथाकथित ठेकेदार चयनात्मक दृष्टिकोण अपना लेता है। परिणामस्वरूप खटास का उपजना लाजमी हो जाता है। व्यक्ति और समाज के बीच के संघर्षों को अलग अलग बिंबों में दर्शाना और भी चुनौतीपूर्ण और तकलीफदेह होता है। समाज परंपरा की दुहाई देता हुआ दीवार बांधता फिरता है। दूसरी तरफ व्यक्ति उनमें सीढ़ियां तलाशता है। दोनों अपनी हठधर्मिता पर कायम है।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: रचना में "आलस्य को पीना छोड़" और "कबंधासुर की तरह जीवन जीना छोड़" जैसे विचार हैं। क्या आप बता सकते हैं कि इन विचारों को सामने लाने के पीछे आपकी प्रेरणा क्या थी?</strong></p><p><strong>राख़: </strong>देखिए। आज के दौर में हम अफवाहों के शिकार हो चुके हैं। AI और फेक न्यूज धड़ल्ले से पीकदान कर रहे हैं। लोगों की जुबान पर' सब चलता है यार' वाला डायलॉग आम हो चुका है। लापरवाही का आलम यह हैं कि हमें यही पता नहीं होता कि बारात कहां खड़ी है। किसी ने भरमाया कि कौआ कान ले गया और हम फौरन कौवे के पीछे भागने लगते हैं। भागने से पहले हम यह जरूरी नहीं समझते कि अपनी कान जांच लें। मानसिक आलस्यता उच्चतम शिखर पर है। राष्ट्रनिर्माण के क्षेत्र में हमारी सहभागिता लगभग गौण है।' मुझे कष्ट चाहिए तथा वंश मोर रोबिनहूड' आदि शीर्षक कविताओं में आप इन सब बातों को तथ्यात्मक रूप से पढ़ पाएंगे। देश में ऐसी अनेको घटनाएं घटी है। अपने नागरिक धर्म का पालन करते हुए अगर हम थोड़े भी चौकन्ने रहते, सजग रहते तो शायद संसद भवन या होटल ताज जैसी इत्यादि दुर्घटनाएं नहीं घटती। KLKD (क्या लेना, क्या देना) की मनः स्थिती ही आज की पीढ़ी की सोच है।। कबंधासुर की तरह जीना छोड़ का तात्पर्य यहाँ यही है कि जिसका सिर न हो, जो विवेकहीन हो। केवल पेट, मुँह और भुजाएँ हो। जिसके लिए दुनिया एक अवसर मात्र हो, केवल भोग और संभोग के लिए।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: चाक चुम्बन का संदेश अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की आपकी सोच क्या रही? आपइसे आज के युवा पाठकों तक कैसे पहुँचाना चाहेंगे?</strong></p><p><strong>राख़: </strong>चाक चुम्बन महज एक काव्य संग्रह नहीं अपितु एक दस्तक है जो युवाओं के नींद में खलल डालना चाहता है। वैसे भी जवानी में नींद बहुत आती है। ऐसेमें युवाओं के लिए यह अलार्म क्लॉक है। चाक चुम्बन का अर्थ है कालचक्र को चूमने की प्रक्रिया। The process of kissing the time wheel. हम जन्म लेते हैं और अपने हिस्से की भागीदारी निभाकर यहां से विदा होते हैं। चाक चुम्बन का प्रश्न युवाओं से है। क्या हमारा काम केवल टूर और ट्रेवलिंग का है या फिर इस धरती पर जन्म लेने का हमारा कुछ उद्देश्य भी है? क्या हमने ठीक-ठाक अपनी जिम्मेवारियों का वहन किया? क्या हमने आजाद, भगत, बिस्मिल की कुर्बानियों के साथ न्याय किया? क्या पिज्जा या बर्गर का लुत्फ उठाते हुए हम सबों को गोलियों की आवाज सुनाई पड़ीं? क्या फेसबुक इंस्टाग्राम सर्किंग करते वक्त उन तोपों की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ी, जिनके point blank की दूरी से हजारों हिंदुस्तानियों के चीथड़े उड़ाए गए, उन भीषण चीत्कारों का कुछ खयाल आया? क्या हमारा दायित्व नहीं कि राष्ट्र निर्माण में हम अपने हिस्से की कम से कम एक ईंट लगाएं? क्या भ्रष्टाचारियों, मुनाफाखोरों तथा बाहरी ताकतों से देश की अस्मिता बचाएं रखने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं? आज का युवा बहुत संवेदनशील और उद्यमी है। पूरी उम्मीद है कि उपरोक्त प्रश्नो को नजरअंदाज आज के बिस्मिल नहीं करेंगे और कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहेंगे।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: हिंदी दिवस के अवसर पर आप क्या संदेश देना चाहेंगे कि हिंदी भाषा के माध्यम से समाज में जागरूकता और सामाजिक चेतना कैसे जगाई जा सकती है?</strong></p><p><strong>राख़: </strong>पूरा देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। परन्तु जिस भाषा में यह चर्चा-ए-आम है, वह अपनी मर्सिया गा रही है। अफसोस की दाल में शर्म का छौंका। हिंदी को उत्तर और दक्षिण के चश्मे से देखना फिजूल है। अंग्रेजी और मंदारिन चीनी के बाद हिंदी विश्व की तीसरी सबसे ज्यादा बोले जानेवाली भाषा है। बावजूद वह जमीन तलाश रही है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में इसने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। आंदोलनकारियों ने तब इसे संचार संवाद का उच्चतम स्रोत माना था।हिंदी किसी एक खास दिवस की मोहताज भी नहीं और न हीं वह किसी पुष्पगुच्छ की अभिलाषी है। वह तो राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने की जिजीविषा रखती है। कमाल की बात है कि भारत के पास अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं। महात्मा गांधी के शब्दों में, "जिस देश की अपनी राष्ट्र भाषा नहीं, वह देश गूंगा है।" तो क्या हम मान लें कि स्वयं को विश्वगुरु बताने वाला देश जिह्वाविहीन है। कतई नहीं।' भय बिन होत न प्रीति' का फॉर्मूला लागू करना होगा। संसद में ठोस विधेयक पारित कर एक मजबूत कानून बनाना होगा। क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर स्कूलों में इसे अनिवार्य करना होगा। मास मीडिया का सारा विज्ञापन हिंदी में हो। हिंदी की प्रचार प्रसार हेतु जिले स्तर पर ही नहीं वरन् गांव स्तर पर भी चौपालों, कवि सम्मेलनों एवम् गोष्ठियों का आयोजन करना होगा ।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: किताब में व्यक्त क्रांतिकारी और विद्रोही भावनाओं को लिखते समय आपके व्यक्तिगत अनुभव और सामाजिक अवलोकन का क्या योगदान रहा?</strong></p><p><strong>राख़: </strong>मेरी प्रिय लेखिका, बाबुषा कोहली जी के शब्दों में कहें तो आप कविता को नहीं लिखते, कविता आपको लिखती है। जो अंदर है वहीं बाहर बहेगा। अपने अनुकूल अणुओं को आकर्षित कर एक नई संरचना को जन्म देगा। तवा गर्म होने पर ही रोटी सेकी जा सकती है। तात्पर्य है कि आपका क्राफ्ट बेलन स्वरूप है जो शब्दों के माध्यम से कविता रूपी रोटी को आकार देता है, सामाजिक अवलोकन आटे का लोई और गर्म तवा व्यक्तिगत अनुभव की आंच। लेखनी में आपकी स्कूलिंग से लेकर आपके आसपास के परिवेश तक का बहुत बड़ा योगदान होता है। इन्हीं सबों के तानेबाने से कविता या कहानी उपजती है। निःसंदेह, मेरी कविता से आक्रामकता एवम् खीझ की गंध आती है। मैं खुद को एक हार्ड-कोर भारतीय मानता हूं और नो कॉम्प्रोमाइज की नीति पर चलता हूं, शायद इसलिए भी। देश सर्वोपरी है। जात धर्म पार्टी संप्रदाय से ऊपर। इसमें किन्तु परंतु की गुंजाइश शून्य है। शायद मेरा फ़ौजी होना भी एक कारण रहा हो। जब पाठकगण' चाक चुम्बन' किताब की यात्रा पर निकलेंगे तो उन्हें मार्ग में ऐसे कई पड़ाव मिलेंगे जहां खून ओर पसीने का कारोबार चलता हुआ दिखेगा। समाज का हर तबका चाहे राशन की लाइन, वोटरोंको वाइन, खेतिहर हताश, मजदूर का विषाद, विद्यार्थियों की मांग, सैनिक की आपबीती, मंदिर-मस्जिद प्रसंग, मीडिया का दायित्व तथा कहीं कहीं प्रतीक्षारत प्रेमिकाएं भी।</p><p><strong>फ्रंटलिस्ट: आपके अनुसार, साहित्य में आलोचना और सामाजिक संदेश देने की ताकत कितनी महत्वपूर्ण है, और चाक चुम्बन में आपने इसे कैसे साकार किया?</strong></p><p><strong>राख़:</strong> कबीर की बड़ी ही खूबसूरत उक्ति है, "निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाए, बिन साबुन पानी बिना निर्मल कहां सुहाए।" आलोचना साहित्य की रीढ़ है। रचना की कमियों को उजागर करना, उसकी वाचालता, उसकी व्याकरण बोध को शश्चिता प्रदान करना, उसका ध्येय है। ठीक इसी प्रकार एक साहित्यकर्मी की भी जिम्मेदारी बनती है कि देश और समाज में व्याप्त विसंगतियों को अपनी लेखनी से उजागर करे। पुरस्कार और पदलोलुपता को दरकिनार कर मुद्दों की बात करे। मेरी किताब' चाक चुम्बन ' में ऐसी कविताओं की बाहुल्यता है जो एक देश के नागरिक को उसकी वोट की अहमियता समझता है, लाल बत्ती वीआईपी संस्कृति से आंख मिलकर प्रश्न पूछने का आत्मबल प्रदान करता है। मज़दूरों, किसानों और विद्यार्थियों के मुख से उनकी माली हालात बयानी का मौका देता है। इसलिए तो इस चर्चा के दौरान मैने बताया था कि चाक चुम्बन एक अलार्म क्लॉक है।</p> ]]>
            </description>
            <category>Author Interviews</category>
            <author>
                <![CDATA[ Frontlist ]]>
            </author>
            <guid>2</guid>
            <pubDate>Mon, 09 15, 2025 10:27 am</pubDate>
        </item>
    </channel>
</rss>
